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शिक्षकों की बढ़ती जिम्मेदारियों से प्रभावित हो रही है शिक्षा प्रणाली

भारत के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की जिम्मेदारियाँ बढ़ती जा रही हैं, जिससे शिक्षा प्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। अध्ययन और अध्यापन के कार्यों के बजाय, शिक्षकों को कई अन्य सरकारी कार्यों में व्यस्त रखा जा रहा है। इससे न केवल उनकी पढ़ाई का समय कम हो रहा है, बल्कि शिक्षकों में निराशा भी बढ़ रही है। जानें इस मुद्दे के पीछे के कारण और इसके संभावित समाधान।
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शिक्षकों की बढ़ती जिम्मेदारियों से प्रभावित हो रही है शिक्षा प्रणाली

शिक्षकों की भूमिका में बदलाव

शिक्षकों का मुख्य कार्य अध्ययन और अध्यापन होना चाहिए, लेकिन भारत के सरकारी स्कूलों में यह कार्य अब लगभग समाप्त हो चुका है। पहले से ही अध्ययन का कार्य छोड़ चुके शिक्षक अब केवल नाममात्र के लिए पढ़ाई कर रहे हैं। उनकी प्राथमिकता अब पाठ्येत्तर गतिविधियों में बदल गई है। शिक्षकों पर इतनी जिम्मेदारियाँ हैं कि वे बच्चों को पढ़ाने के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है, और इसका एक मुख्य कारण यह है कि अध्यापन को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है।


शिक्षकों की अतिरिक्त जिम्मेदारियाँ

शिक्षकों को स्कूल के बाहर और अंदर कई अन्य कार्य करने होते हैं, जिनका शिक्षा से कोई संबंध नहीं है। उदाहरण के लिए, 12 राज्यों के शिक्षक मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण में लगे हुए हैं। कुछ शिक्षक स्थानीय चुनावों का संचालन कर रहे हैं, और आगामी जनगणना में भी उनकी भागीदारी होगी। इसके अलावा, चुनावों के दौरान मतदान और मतगणना में भी शिक्षकों की भूमिका होती है।


शिक्षकों की बढ़ती कार्यभार

शिक्षकों को स्कूल के बाहर डेढ़ दर्जन से अधिक सरकारी कार्य करने होते हैं। एक शिक्षक ने मजाक में कहा कि अगर सरकार खेती करने का काम भी उन पर डाल दे, तो वे उसे भी कर लेंगे। सरकार के विभिन्न सर्वेक्षणों और राहत कार्यों में भी शिक्षकों को शामिल किया जाता है।


मिड डे मील की जिम्मेदारी

शिक्षकों को मिड डे मील तैयार करने का कार्य भी सौंपा गया है। राशन खरीदने से लेकर खाना तैयार करने और बच्चों को खिलाने तक का कार्य शिक्षकों के जिम्मे है। इसके अलावा, सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि बच्चे स्कूल में खाना खा रहे हैं, शिक्षकों को फेशियल रिकग्निशन करने और वीडियो बनाने का कार्य भी दिया है।


शिक्षकों की अन्य जिम्मेदारियाँ

शिक्षकों को शिक्षा मंत्री के भाषण सुनाने और उसकी वीडियो बनाने का कार्य भी करना होता है। यह कार्य हर सरकारी कार्यक्रम के बाद किया जाता है, जिससे शिक्षकों का समय पढ़ाई में नहीं लग पाता। ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां स्कूलों में केवल दो या तीन शिक्षक होते हैं, वहां पढ़ाई का समय और भी कम हो जाता है।


शिक्षकों की नौकरी छोड़ने का बढ़ता ट्रेंड

प्रोफेसर कृष्ण कुमार ने हाल ही में एक लेख में बताया कि पिछले दो दशकों में कई शिक्षक अपनी नौकरी छोड़ रहे हैं। यह केवल बेहतर नौकरी की तलाश में नहीं है, बल्कि स्कूलों में बच्चों के व्यवहार में बदलाव और नौकरशाही के कारण भी है। शिक्षकों को पढ़ाने के बजाय प्रबंधन कार्यों में लगा दिया गया है।


शिक्षकों की स्थिति

शिक्षकों को अब क्लर्क या मैनेजर बना दिया गया है, जिससे उनकी रचनात्मकता और बच्चों के समग्र विकास पर ध्यान देने की क्षमता प्रभावित हो रही है। उन्हें प्रबंधकीय कार्यों का सबूत इकट्ठा करने के लिए मजबूर किया जाता है, जिससे उनकी पढ़ाई पर ध्यान नहीं रह जाता। इस स्थिति से शिक्षकों में निराशा बढ़ रही है और वे नौकरी छोड़ रहे हैं।