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आशा भोसले: संगीत और पाक कला की अद्भुत यात्रा

आशा भोसले का निधन भारतीय संगीत जगत के लिए एक बड़ा नुकसान है। उनकी आवाज ने दशकों तक लोगों को मंत्रमुग्ध किया। लेकिन उनके जीवन का एक और महत्वपूर्ण पहलू था उनका खाना बनाने का जुनून। आशा जी ने न केवल अपने परिवार के लिए बल्कि फिल्म इंडस्ट्री के लिए भी अद्भुत व्यंजन बनाए। उन्होंने कई दिग्गजों से पाक कला सीखी और दुबई में अपना रेस्तरां खोला। उनकी विरासत आज भी उनके गीतों और पकवानों के माध्यम से जीवित है।
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आशा भोसले: संगीत और पाक कला की अद्भुत यात्रा

आशा भोसले का निधन


नई दिल्ली: भारतीय संगीत के एक स्वर्णिम युग का समापन हो गया है। 12 अप्रैल को महान पार्श्वगायिका आशा भोसले ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी आवाज ने न केवल भारतीयों बल्कि वैश्विक स्तर पर भी लोगों को मोहित किया। लेकिन आशा जी का एक और पहलू था, जो उनके संगीत के समान ही समृद्ध था - उनका खाना बनाने का जुनून। उनके लिए रसोई केवल एक कमरा नहीं, बल्कि एक ऐसा मंच था जहां वे अपने जज़्बात और प्रेम को पकाती थीं।


पाक कला का प्रेम

आशा भोसले का खाना बनाने का शौक केवल उनके परिवार तक सीमित नहीं था; फिल्म इंडस्ट्री भी उनके हाथों के स्वाद की दीवानी थी। उन्होंने एक बार कहा था कि उनके घर हर हफ्ते 60-70 लोग सिर्फ खाने के लिए आते थे। रिकॉर्डिंग से थकी-हारी लौटने के बाद भी, वे बड़े पतीलों में खाना तैयार करती थीं। उनके बेटे आनंद को उनकी बिरयानी और मटन-चिकन बेहद पसंद था, और वह हमेशा इसकी फरमाइश किया करता था।


दिग्गजों से सीखे पाक कला के गुर

आशा जी ने खाना बनाने की कला भी कई दिग्गजों से सीखी। उन्होंने मोमोज बनाना अभिनेत्री माला सिन्हा से सीखा, जबकि राज कपूर ने उन्हें पेशावरी बिरयानी के खास टिप्स दिए। दिल्ली के प्रसिद्ध बुखारा रेस्तरां के अफगान शेफ्स से उन्होंने दाल मखनी की बारीकियां सीखी और मशहूर गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की पत्नी से बिरयानी बनाने का हुनर हासिल किया।


पेशावरी दाल और लता दीदी की पसंद

अपनी प्रसिद्ध 'मां की दाल' के बारे में वे गर्व से बताती थीं कि यह रेसिपी उन्होंने पेशावर के लोगों से सीखी थी। उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर भी उनकी पाक कला की प्रशंसा करती थीं, खासकर शमी कबाब के लिए।


आशाज रेस्तरां: स्वाद की वैश्विक पहचान

2002 में, उन्होंने अपने इस जुनून को एक नई पहचान दी और दुबई में 'आशाज' नाम से अपना पहला रेस्तरां खोला। यह केवल एक रेस्तरां नहीं था, बल्कि उनके स्वाद की अमिट छाप थी, जो बाद में मिडिल ईस्ट और यूनाइटेड किंगडम के बर्मिंघम और मैनचेस्टर जैसे शहरों तक फैल गई। आशा जी अक्सर कहती थीं कि शेफ कोट पहनकर उन्हें उतनी ही खुशी होती थी, जैसे कोई महंगा सूट पहनने पर।


संगीत और स्वाद की अमिट धरोहर

आशा भोसले का निधन संगीत और कला जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उन्होंने साबित किया कि एक कलाकार की रचनात्मकता किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं होती। उनके लिए गाना और खाना बनाना दोनों ही दिल से किए जाने वाले कार्य थे। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत हमेशा उनके कालजयी गीतों और पकवानों की खुशबू में जीवित रहेगी।