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भूत बंगला: अक्षय कुमार की नई हॉरर-कॉमेडी का रिव्यू

भूत बंगला, अक्षय कुमार की नई हॉरर-कॉमेडी, प्रियदर्शन के निर्देशन में बनी है। इस फ़िल्म में कई प्रसिद्ध कलाकार शामिल हैं, लेकिन क्या यह दर्शकों की उम्मीदों पर खरा उतरती है? जानें फ़िल्म की कहानी, अभिनय और तकनीकी पक्ष के बारे में। क्या यह फ़िल्म आपको देखने लायक है? पढ़ें पूरी समीक्षा में।
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भूत बंगला: अक्षय कुमार की नई हॉरर-कॉमेडी का रिव्यू

भूत बंगला: अक्षय कुमार की वापसी

नई हॉरर-कॉमेडी फ़िल्म 'भूत बंगला' में अक्षय कुमार एक बार फिर सिनेमा में लौट आए हैं। प्रियदर्शन द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म ने दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बनकर अपनी पहचान बनाई है। इसमें तब्बू, राजपाल यादव, परेश रावल, मिथिला पालकर, वामिका गब्बी और असरानी जैसे कई प्रसिद्ध कलाकार शामिल हैं। यह फ़िल्म अक्षय और प्रियदर्शन की लंबे समय से प्रतीक्षित जोड़ी का प्रतीक है। जब भी इनकी जोड़ी का नाम लिया जाता है, तो 'हेरा फेरी' और 'भूल भुलैया' जैसी यादगार फ़िल्मों की यादें ताजा हो जाती हैं। 14 साल बाद जब यह जोड़ी 'भूत बंगला' के साथ लौटी, तो दर्शकों की उम्मीदें बहुत ऊँची थीं। लेकिन, यह फ़िल्म उन उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाई। फ़िल्म डरावनी होने का प्रयास करती है, लेकिन शोर और पुरानी कॉमेडी के फॉर्मूलों में उलझी रहती है।


कहानी: लोककथा और लॉजिक का संघर्ष

इस फ़िल्म की कहानी मंगलपुर नामक एक काल्पनिक गांव की लोककथा से शुरू होती है, जहाँ एक राक्षस नई दुल्हनों को अगवा करता है। यह प्लॉट 1979 की फ़िल्म 'जानी दुश्मन' की याद दिलाता है। फ़िल्म में लॉजिक तब टूटता है जब 49 साल के जिस्सू सेनगुप्ता को 58 साल के अक्षय कुमार के पिता के रूप में दिखाया जाता है। कहानी मंगलपुर से लंदन और फिर एक भुतहा महल के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ मिथिला पालकर को एक आलीशान लेकिन शापित बंगला विरासत में मिलता है।


अभिनय: सितारों की फौज, पर स्क्रिप्ट कमजोर

अक्षय कुमार अपनी पहचान के अनुसार ऊर्जा से भरे हुए नजर आते हैं। वे एक्शन और पंचलाइन्स में सहज हैं, लेकिन एक कमजोर और लंबी स्क्रिप्ट को संभालना उनके लिए भी चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। परेश रावल, राजपाल यादव और असरानी जैसे अनुभवी कलाकार फ़िल्म में हैं, लेकिन उन्हें केवल 'फिजिकल कॉमेडी' तक सीमित कर दिया गया है, जो अब पुरानी और उबाऊ लगती है। तब्बू और वामिका गब्बी जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों का सही उपयोग नहीं किया गया। तब्बू का किरदार प्रभावहीन लगता है, जबकि वामिका का रहस्यमय रोल अंत तक बेजान बना रहता है।


तकनीकी पक्ष: हॉरर कम, शोर ज्यादा

फ़िल्म का हॉरर तत्व पूरी तरह से 'जंप स्केयर्स' और तेज बैकग्राउंड म्यूजिक पर निर्भर है। संगीत डराने के बजाय तनाव पैदा करता है, जो कई बार पुराने टीवी सोप ओपेरा जैसा अनुभव देता है।


वधुसुर की कथा: देव-असुर वंश और पौराणिक भविष्यवाणियों वाला हिस्सा दिलचस्प हो सकता था, लेकिन इसे दर्शकों को इतना 'समझाया' गया है कि रहस्य का रोमांच खत्म हो जाता है।


संगीत: 'राम जी आके भला करेंगे' को छोड़कर कोई भी गाना याद रखने लायक नहीं है। 'अमी जे तोमार' जैसे कल्ट पलों को फिर से रचने की कोशिश पूरी तरह नाकाम रही है।


दूसरा हाफ: बिखराव और उपदेश

फ़िल्म का दूसरा भाग सबसे अधिक निराश करता है। कहानी फ्लैशबैक और लंबे स्पष्टीकरणों के बोझ तले दब जाती है। एक आधुनिक महिला (मिथिला) का बिना किसी तर्क के पुरानी कुरीतियों को मान लेना खटकता है। साथ ही, फ़िल्म के बीच में 'पुत्र धर्म' जैसे उपदेश कहानी के प्रवाह को पूरी तरह तोड़ देते हैं।


निष्कर्ष: क्या आपको यह फिल्म देखनी चाहिए?

'भूत बंगला' एक ऐसी यात्रा है जो रोमांचक 'रोलरकोस्टर' होने का वादा करती है, लेकिन वास्तव में यह एक धीमी और चरमराती हुई 'भूतिया घर की सैर' बनकर रह जाती है। प्रियदर्शन की फ़िल्मों में जो सिचुएशनल कॉमेडी और टाइमिंग होती थी, उसकी यहाँ भारी कमी खलती है। यदि आप अक्षय कुमार और प्रियदर्शन के कट्टर प्रशंसक हैं, तो आप इसे एक बार देख सकते हैं। लेकिन अगर आप 'भूल भुलैया' जैसी बारीकी और हंसी की तलाश में हैं, तो यह 'बंगला' आपको निराश करेगा। काश, इस बंगले में 'भूत' कम और 'दिमाग' थोड़ा ज्यादा होता।


निर्देशक: प्रियदर्शन


लेखक: आकाश कौशिक, अभिलाष नायर, प्रियदर्शन


भूत बांग्ला कलाकार: अक्षय कुमार, परेश रावल, वामिका गब्बी, राजपाल यादव, मिथिला पालकर, असरानी जी, तब्बू


भूत बांग्ला फिल्म रेटिंग: 2/5