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भारत की तकनीकी पहचान और राजनीतिक विरोध: एआई शिखर सम्मेलन की समीक्षा

भारत की तकनीकी पहचान को उजागर करने वाले एआई शिखर सम्मेलन में कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया अर्धनग्न प्रदर्शन एक विवाद का विषय बन गया है। राहुल गांधी ने इसे ओछी राजनीति का उदाहरण बताया। इस लेख में जानें कि कैसे कांग्रेस ने इस महत्वपूर्ण वैश्विक आयोजन को राजनीतिक द्वेष का शिकार बना दिया और भारत की प्रतिष्ठा को दांव पर लगाया। क्या यह सम्मेलन भारत का था या किसी राजनीतिक दल का? जानें इस लेख में।
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भारत की तकनीकी पहचान और राजनीतिक विरोध: एआई शिखर सम्मेलन की समीक्षा

भारत की बढ़ती तकनीकी पहचान

यह सम्मेलन केवल एक औपचारिक सभा नहीं थी, बल्कि यह भारत की वैश्विक तकनीकी पहचान को उजागर करने का एक अवसर था। हालांकि, भारत मंडपम के अंदर युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया अर्धनग्न प्रदर्शनएक अस्वस्थ राजनीतिक प्रदर्शन था। राहुल गांधी ने अपने कार्यकर्ताओं को बब्बर शेरकहकर यह स्पष्ट किया कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को घेरने के लिए देश की प्रतिष्ठा को दांव पर लगाते रहेंगे।


एआई शिखर सम्मेलन


कहते हैं “घर का भेदी लंका ढाए”— जब दुनिया भारत को एक उभरती हुई आर्थिक, डिजिटल और कूटनीतिक शक्ति के रूप में देख रही है, तब देश के भीतर एक राजनीतिक वर्ग हर राष्ट्रीय उपलब्धि को कमजोर करने पर आमादा है। भारत की अर्थव्यवस्था, डिजिटल ढांचे और कूटनीतिक सक्रियता में हाल के वर्षों में जो बदलाव आया है, उसने वैश्विक स्तर पर देश की भूमिका को नया आकार दिया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए।आई।) जैसे क्षेत्रों में भारत की पहल इसी बदलाव का हिस्सा है। दिल्ली में 16 से 20 फरवरी 2026 के बीच आयोजित ‘एआई इंपैक्ट सम्मिट 2026’ इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, जिसका उद्देश्य तकनीकी सहयोग के साथ-साथ ए।आई के नैतिक और लोकतांत्रिक उपयोग पर वैश्विक सहमति बनाना भी था।


यह सम्मेलन केवल एक औपचारिक सभा नहीं, बल्कि भारत की तकनीकी पहचान को दर्शाने का एक अवसर था। दुनियाभर से आए नीति-निर्माता, तकनीकी विशेषज्ञ और निवेशक भारत की डिजिटल प्रगति को समझने और उसमें भागीदारी के लिए एकत्र हुए थे। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी और उनके समर्थकों ने इस अवसर को ओछी राजनीति का मंच बना दिया।


असहमति और विरोध लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा हैं। लेकिन युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया ‘अर्धनग्न प्रदर्शन’ स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक वैमनस्य का एक भद्दा उदाहरण है। राहुल गांधी ने अपने कार्यकर्ताओं को ‘बब्बर शेर’ कहकर यह संदेश दिया है कि वे प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को घेरने के लिए देश की प्रतिष्ठा को दांव पर लगाते रहेंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे वैचारिक खोखलेपन का प्रतीक बताया है, और कुछ भाजपा-विरोधी दलों ने भी इस फूहड़ता से दूरी बना ली है।


भारत की छवि को धूमिल करने की यह मानसिकता नई नहीं है। 1927 में अमेरिकी लेखिका कैथरीन मेयो ने अपनी पुस्तक ‘मदर इंडिया’ में भारतीय समाज की समस्याओं को इस तरह प्रस्तुत किया कि मानो भारत स्वशासन के योग्य नहीं है। गांधीजी ने इसे “नाली निरीक्षक की रिपोर्ट” कहकर खारिज किया था। उन्होंने समाज की कमियों को सुधारने का आह्वान किया, न कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उजागर कर देश की साख गिराने का। आज कांग्रेस नेतृत्व उसी मानसिकता से ग्रस्त है, जहां राजनीतिक द्वेष में एक घटना को भारत के वैश्विक आयोजन की विफलता का प्रमाण मानकर प्रस्तुत किया जा रहा है।


एआई शिखर सम्मेलन में एक निजी विश्वविद्यालय द्वारा प्रदर्शित ‘रोबोटिक डॉग’— जो वास्तव में चीन निर्मित था— को आधार बनाकर राहुल गांधी ने पूरे आयोजन को “अव्यवस्थित” और “तमाशा” करार दिया। एक निजी शिक्षण संस्थान, जिसे विवाद के बाद कार्यक्रम से बाहर कर दिया गया था, उसके अपराध को राष्ट्रीय ‘अक्षमता’ का प्रतीक बना देना वही मानसिकता है, जो कभी औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा भारतीय समाज के विरुद्ध इस्तेमाल की जाती थी।


ऐसे अवसर भी आए हैं जब राजनीतिक मतभेदों के बावजूद राष्ट्रीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी गई। 1994 में जब पाकिस्तान ने कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में उठाने की कोशिश की, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव ने विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सौंपा था। राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए उस समय दलगत राजनीति को दरकिनार कर दिया गया।


अब जिस एआई शिखर सम्मेलन में गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न, ओपन एआई और एंथ्रोपिक जैसी शीर्ष वैश्विक तकनीकी कंपनियों के अधिकारी उपस्थित थे, फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों सहित कई राष्ट्राध्यक्ष शामिल थे, लगभग 90 देशों ने ‘नई दिल्ली घोषणा’ को स्वीकार किया और 250 अरब डॉलर से अधिक के निवेश की प्रतिबद्धता जताई, उसे कांग्रेस ने महज सरकार का ‘जनसंपर्क अभियान’ बताकर खारिज कर दिया। क्या यह सम्मेलन किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि भारत का था?


इसी वैश्विक मंच पर भारतीय एआई स्टार्टअप ‘सर्वम’ ने अपना नया ‘इंडस एआई चैट एप’ जारी किया, जो 22 भारतीय भाषाओं में संचालित होता है। यह एप कंपनी के 105 बिलियन मानक वाले बड़े भाषाई ढांचे पर आधारित है, जो विशेष रूप से भारतीय उपभोक्ताओं के लिए विकसित किया गया है। यह तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक ठोस कदम है। लेकिन इस पर गौरवान्वित होने के बजाय कांग्रेस प्रेरित इको-सिस्टम पूरे आयोजन को बदनाम करने में जुटा है।


वैश्विक मंचों पर यह संतुलन आवश्यक है कि घरेलू आलोचना किस सीमा तक व्यक्त की जाए। यहां सवाल यह नहीं है कि मोदी सरकार की आलोचना होनी चाहिए या नहीं। असल सवाल यह है कि क्या असहमति या विरोध के नाम पर देश की प्रतिष्ठा को दांव पर लगाना उचित है? क्या राजनीतिक खींचतान को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक ले जाना सही है?


स्वतंत्रता के दशकों बाद तक भारत की वैश्विक पहचान को गांधीजी, गरीबी, सांप-सपेरों और ताजमहल से जोड़ा जाता था। लेकिन आज वही भारत विश्व आर्थिकी, कूटनीति और तकनीकी विमर्श में सहभागी बन चुका है। एआई और जी20 जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजन करने की क्षमता रखता है। विडंबना है कि मोदी सरकार को घेरने की जल्दबाजी में कांग्रेस नेतृत्व ने अपनी कुंठा को देश के सामने रख दिया है।