Newzfatafatlogo

गंगा दशहरा: गंगा के धरती पर अवतरण का पर्व

गंगा दशहरा, राजा भगीरथ द्वारा गंगा के धरती पर अवतरण का पर्व है। इस दिन गंगा स्नान, दान और उपासना का विशेष महत्व है। जानें गंगा की पूजा विधि और इसके पीछे की कथा, जिसमें गंगा के धरती पर आने की प्रेरणादायक कहानी है। इस पर्व का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व जानने के लिए पढ़ें पूरा लेख।
 | 
गंगा दशहरा: गंगा के धरती पर अवतरण का पर्व

गंगा दशहरा का महत्व

राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलाने के लिए भगवान शिव की आराधना की और गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाए। जिस दिन उन्होंने गंगा को लाया, वह दिन गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हस्त नक्षत्र में गंगा का आगमन हुआ था। इस दिन गंगा स्नान, दान, जप, तप, उपासना और उपवास का विशेष महत्व है, जिससे पापों से मुक्ति मिलती है। महर्षि व्यास ने पद्म पुराण में गंगा की महिमा का वर्णन किया है, जिसमें कहा गया है कि गंगा के दर्शन से सभी पाप समाप्त हो जाते हैं। भविष्य पुराण में उल्लेख है कि जो व्यक्ति इस दिन गंगा के जल में खड़ा होकर गंगा स्तोत्र का पाठ करता है, उसे वांछित फल प्राप्त होता है।


गंगा दशहरा की पूजा विधि

गंगा की पूजा के लिए मंत्र है: 'ओम नमो भगवति हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा'। इसका अर्थ है, 'हे भगवती गंगे! मुझे बार-बार मिल, पवित्र कर।' इस मंत्र का जाप करते हुए पुष्प, दूध, घी, शहद, मिठाई और वस्त्र से गंगा की पूजा करनी चाहिए। पूजा के दौरान संकल्प लेकर दस बार डुबकी लगानी चाहिए और फिर साफ वस्त्र पहनकर घी से चुपड़े हुए काले तिल जल में डालने चाहिए। इसके बाद गंगा की प्रतिमा का पूजन करना चाहिए।


गंगा दशहरा की कथा

एक बार महाराज सगर ने एक बड़ा यज्ञ किया, जिसकी रक्षा उनके पौत्र अंशुमान ने की। इन्द्र ने यज्ञ का अश्व चुरा लिया, जिससे यज्ञ में विघ्न आया। अंशुमान ने अश्व को खोजने के लिए पृथ्वी को खोदा और महर्षि कपिल के पास पहुंचे, जहां अश्व घास चर रहा था। महर्षि की समाधि टूटने से सगर की प्रजा भस्म हो गई। उनके उद्धार के लिए भगीरथ ने कठोर तप किया और गंगा को धरती पर लाने का वरदान मांगा। ब्रह्मा ने गंगा को अपने कमण्डल से छोड़ा, और भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में समेट लिया। अंततः भगीरथ की तपस्या से गंगा हिमालय की घाटियों से निकलकर धरती पर आई।