पद्मिनी एकादशी: जानें इस विशेष व्रत का महत्व और पूजा विधि
पद्मिनी एकादशी का महत्व
नई दिल्ली: पद्मिनी एकादशी, जो अधिकमास में आती है, हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण और पुण्यदायी मानी जाती है। यह व्रत व्यक्ति के जीवन से दुख और संकट को दूर करने के साथ-साथ भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने का साधन है। इस वर्ष, 27 मई को देशभर में श्रद्धा और भक्ति के साथ इसे मनाया जाएगा। यह एकादशी हर तीन साल में एक बार आती है, जिससे इसका महत्व और बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन विधिपूर्वक पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
एकादशी तिथि और व्रत का पारण
हिंदू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के अधिकमास की एकादशी तिथि 26 मई को सुबह 5:10 बजे से शुरू होकर 27 मई को सुबह 6:21 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार, व्रत 27 मई को मान्य रहेगा। व्रत का पारण 28 मई को सुबह 5:25 बजे से 7:56 बजे के बीच किया जाएगा। धार्मिक दृष्टि से सही समय पर पारण करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
विशेष योग और शुभ मुहूर्त
आज के शुभ मुहूर्त और विशेष योग
इस बार पद्मिनी एकादशी पर कई शुभ संयोग बन रहे हैं, जो पूजा और व्रत के महत्व को और बढ़ा रहे हैं।
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:03 से 4:44 बजे तक।
गोधूलि मुहूर्त: शाम 7:10 से 7:31 बजे तक।
इसके अलावा, आज सर्वार्थसिद्धि योग और रवि योग का निर्माण हो रहा है, जो सुबह 5:25 से 5:56 बजे तक रहेगा। ज्योतिष शास्त्र में इन योगों को फलदायी माना जाता है।
पद्मिनी एकादशी की पूजा विधि
पद्मिनी एकादशी की पूजा विधि
इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र पहनने चाहिए। पूजा स्थान को अच्छे से साफ करने के बाद भगवान विष्णु, बाल गोपाल, शालिग्राम और श्री यंत्र की स्थापना करें। इसके बाद पंचामृत से अभिषेक कर पीले वस्त्र, फूल और तुलसी अर्पित करें। पूजा के दौरान घी का दीपक और धूप जलाना शुभ माना जाता है। भगवान विष्णु को फल, मिठाई, पंचामृत और तुलसी दल का भोग अर्पित किया जाता है। इसके बाद विष्णु सहस्रनाम और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करना लाभकारी माना गया है।
दान-पुण्य का महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, एकादशी के दिन दान-पुण्य करने से कई गुना पुण्य फल प्राप्त होता है। शाम के समय तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाकर उसकी परिक्रमा करने का विशेष महत्व है। हालांकि, इस दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना वर्जित है, इसलिए पूजा के लिए तुलसी पहले ही तोड़कर रख लेनी चाहिए।
पौराणिक कथा
पद्मिनी एकादशी की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, त्रेतायुग में हैहय वंश के राजा कृतवीर्य अपनी हजार रानियों के बावजूद संतान सुख से वंचित थे। अनेक प्रयासों और यज्ञों के बाद भी उन्हें पुत्र प्राप्त नहीं हुआ। इसके बाद राजा ने अपनी प्रिय रानी पद्मिनी के साथ वन में जाकर कठोर तपस्या शुरू की। गंधमादन पर्वत पर कई वर्षों की तपस्या के बाद माता अनुसूया ने रानी पद्मिनी को अधिकमास की शुक्ल पक्ष की पद्मिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि यह व्रत भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और इससे सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं।
रानी पद्मिनी ने पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ यह व्रत किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। बाद में उनके यहां कार्तवीर्य नामक अत्यंत शक्तिशाली पुत्र का जन्म हुआ। धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से पद्मिनी एकादशी का व्रत करता है और इसकी कथा सुनता है, उसे जीवन में यश, सुख और अंत में विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।
