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माता कुंती: महाभारत की दिव्य शक्ति और उनके जीवन की यात्रा

माता कुंती का व्यक्तित्व महाभारत की कथा में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वह केवल पांडवों की मां नहीं, बल्कि सहनशक्ति और धर्म की प्रतीक थीं। उनके जन्म की दिव्यता और जीवन की यात्रा हमें सिखाती है कि कैसे मोह का त्याग करके मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। इस लेख में हम जानेंगे कि माता कुंती किसका अवतार थीं और उनकी मृत्यु की हृदयविदारक कहानी।
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माता कुंती: महाभारत की दिव्य शक्ति और उनके जीवन की यात्रा

माता कुंती का अद्वितीय व्यक्तित्व

महाभारत की कथा में माता कुंती का चरित्र अत्यंत धैर्यवान और संघर्षशील रहा है। वह केवल पांडवों की माता नहीं, बल्कि सहनशक्ति और धर्म की प्रतीक मानी जाती थीं। हालांकि, बहुत से लोग यह नहीं जानते कि कुंती का जन्म साधारण नहीं था, बल्कि वह एक दिव्य शक्ति का अंश थीं। उनका जीवन त्याग और तपस्या का एक अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने कुरुवंश की नींव को मजबूती से थामे रखा। माता कुंती के जन्म की दिव्यता से लेकर उनके अंतिम समय तक की यात्रा हमें यह सिखाती है कि कैसे संसार में मोह का त्याग करके मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। इस लेख में हम जानेंगे कि माता कुंती किसका अवतार थीं और उनकी मृत्यु कैसे हुई।


कुंती का अवतार

महाभारत के अनुसार, माता कुंती को 'सिद्धि' का अवतार माना जाता है, जिसे सफलता और निपुणता की देवी माना जाता है। सिद्धि के अंश से ही कुंती का प्राकट्य हुआ था। कुछ धार्मिक ग्रंथों में उन्हें 'मति' यानी बुद्धि का अवतार भी कहा गया है।


कुंती की अद्भुत क्षमता

कुंती के पूर्व जन्म और दैवीय अंश के कारण उनके पास ऋषि दुर्वासा द्वारा दिए गए मंत्रों को सिद्ध करने की अद्भुत क्षमता थी। इसी मंत्र शक्ति के माध्यम से माता कुंती ने विभिन्न देवताओं का आह्वान कर तेजस्वी पुत्रों, अर्थात पांडवों को प्राप्त किया।


महाभारत युद्ध के बाद का जीवन

महाभारत के युद्ध में विजय के बाद, जब युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर के राजा का पद संभाला, तो माता कुंती कई वर्षों तक राजमहल में रहीं। उन्होंने धृतराष्ट्र और गांधारी की सेवा की और अपने पुत्रों तथा वधुओं के साथ पारिवारिक क्षण बिताए।


समय के साथ, जब उनके मन में संसार के प्रति वैराग्य उत्पन्न हुआ, तो धृतराष्ट्र और गांधारी ने वानप्रस्थ का निर्णय लिया। इस प्रकार, कुंती भी उनके साथ वन में चली गईं।


कुंती की मृत्यु

माता कुंती की मृत्यु एक हृदयविदारक घटना थी। वन में रहते हुए धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती कठोर तपस्या कर रहे थे। एक दिन अचानक वन में भीषण आग लग गई, लेकिन तपस्या में लीन होने के कारण वे उसी आग में जल गए।


इस तपस्या के दौरान आग में जलने के कारण धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती को मोक्ष की प्राप्ति हुई। माना जाता है कि मृत्यु के बाद श्रीकृष्ण ने माता कुंती को अपने धाम में स्थान दिया।