लक्ष्मी पंचमी पर्व: तिथि, पूजा विधि और महत्व
लक्ष्मी पंचमी का पर्व 23 मार्च 2026 को मनाया जाएगा, जो चैत्र नवरात्रि के दौरान आता है। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है, और इसे 'श्री पंचमी' भी कहा जाता है। जानें इस पर्व की तिथि, पूजा विधि और इसके महत्व के बारे में, जिससे आप आर्थिक समृद्धि और सुख की प्राप्ति कर सकें।
| Mar 23, 2026, 11:31 IST
लक्ष्मी पंचमी का महत्व
चैत्र नवरात्रि के दौरान लक्ष्मी पंचमी का पर्व विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह पर्व चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष, यह पर्व 23 मार्च 2026 को आएगा। नवरात्रि के पांचवे दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है, और इस बार लक्ष्मी पंचमी पर एक शुभ संयोग बन रहा है। मान्यता है कि इस दिन मां लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न होती हैं। यदि आप आर्थिक परेशानियों का सामना कर रहे हैं या मेहनत के बावजूद धन नहीं टिकता, तो लक्ष्मी पंचमी का व्रत करना आपके लिए लाभकारी हो सकता है। आइए, जानते हैं लक्ष्मी पंचमी की तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि और इसके महत्व के बारे में...
तिथि और मुहूर्त
द्रिक पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि 22 मार्च की रात 09:16 बजे से शुरू हो रही है। यह तिथि 23 मार्च की शाम 06:38 बजे समाप्त होगी। इस प्रकार, उदयातिथि के अनुसार, 23 मार्च 2026 को लक्ष्मी पंचमी का व्रत किया जाएगा।
पूजन विधि
इस दिन सुबह जल्दी स्नान करने के बाद सफेद या गुलाबी रंग के वस्त्र पहनें। फिर पूजा स्थल पर मां लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें। यदि आपके पास श्रीयंत्र है, तो उसकी भी विधि-विधान से पूजा करें। मां लक्ष्मी को गंगाजल और दूध से अभिषेक करें और उन्हें गुलाब या कमल का फूल अर्पित करें। इसके बाद गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं और उसमें एक लौंग डालें, जिससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। पूजा के अंत में आरती करें और किसी भी भूल के लिए क्षमा मांगें।
महत्व
हिंदू धर्म में लक्ष्मी पंचमी का विशेष महत्व है। इसे 'श्री पंचमी' या 'कल्पादि पंचमी' भी कहा जाता है। इस दिन व्रत करने से व्यक्ति के जीवन में सुख और समृद्धि आती है, साथ ही घर की दरिद्रता भी समाप्त होती है।
मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः॥
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः॥
ॐ पृथ्वी त्वया घृता लोका देवि त्वं विष्णुना घृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥
