विभुवन संकष्टी चतुर्थी: पूजा विधि और महत्व
03 जून 2026 को विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत मनाया जा रहा है, जिसमें भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन भक्त सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। जानें इस व्रत की तिथि, पूजा विधि और इसके महत्व के बारे में।
| Jun 3, 2026, 09:20 IST
विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत
आज, 03 जून 2026 को विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत मनाया जा रहा है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व है। उन्हें सुख और समृद्धि का दाता तथा विघ्नों का नाशक माना जाता है। अधिक मास के कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी को विभुवन संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जो तीन साल में एक बार आती है और इसे दुर्लभ माना जाता है। हर महीने संकष्टी चतुर्थी पर गणपति बप्पा की पूजा होती है, लेकिन अधिक मास की संकष्टी चतुर्थी का महत्व विशेष होता है। इस लेख में हम विभुवन संकष्टी चतुर्थी की तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि और इसके महत्व पर चर्चा करेंगे।
संकष्टी चतुर्थी की तिथि
वैदिक पंचांग के अनुसार, 03 जून 2026 को रात 9:22 बजे अधिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि आरंभ होगी। यह तिथि 04 जून 2026 की रात 11:31 बजे समाप्त होगी। संकष्टी चतुर्थी पर चंद्र देव को अर्घ्य देने का विशेष महत्व है। चंद्रोदय के अनुसार, विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत 03 जून 2026 को किया जाएगा।
पूजा विधि
इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। फिर भगवान गणेश का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल को साफ करें और लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। चौकी पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें, गंगाजल छिड़कें और पंचामृत से उनका अभिषेक करें। भगवान को दूर्वा, सिंदूर, लाल पुष्प, पान और अक्षत अर्पित करें। बप्पा को मोदक या लड्डू का भोग लगाएं और पूजा में हुई भूल के लिए क्षमा मांगें।
महत्व
अधिक मास में आने वाली विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष फलदायी माना जाता है। इस दिन भक्त गणपति बप्पा की पूजा करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। हिंदू धर्म में बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित होता है, इसलिए बुधवार को पड़ने वाली यह संकष्टी चतुर्थी विशेष महत्व रखती है।
पूजा और चंद्र अर्घ्य
दिनभर व्रत रखने के बाद शाम को भगवान गणेश की पूजा करें। विभुवन संकष्टी चतुर्थी की कथा पढ़ें और गणेश जी की आरती करें। चंद्रोदय के बाद तांबे या चांदी के पात्र में दूध, जल, अक्षत और फूल मिलाकर चंद्र देव को अर्घ्य दें। फिर भगवान गणेश का स्मरण करते हुए व्रत का पारण करें।
