सीता नवमी: मां सीता के प्रकट होने का पर्व और पूजा विधि
सीता नवमी, जिसे जानकी नवमी भी कहा जाता है, मां सीता के प्रकट होने का पर्व है। यह दिन स्त्री शक्ति और मर्यादा का प्रतीक है। इस दिन भक्त माता सीता की पूजा करते हैं और विशेष व्रत रखते हैं। जानें इस पर्व का महत्व, पूजा विधि और शुभ मुहूर्त, जिससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहे।
| Apr 25, 2026, 11:27 IST
सीता नवमी का महत्व
आज सीता नवमी का पर्व है, जिसे जानकी नवमी भी कहा जाता है। यह दिन मां सीता के प्रकट होने का प्रतीक है, जो स्त्री शक्ति और अटूट मर्यादा का प्रतीक मानी जाती हैं। सीता का चरित्र हमें आत्मबल, कर्तव्यनिष्ठा और कठिनाइयों में धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा देता है। आइए, हम आपको इस पर्व का महत्व और पूजा विधि के बारे में बताते हैं।
सीता नवमी के बारे में जानकारी
सीता नवमी का त्योहार सनातन धर्म में विशेष महत्व रखता है। पंडितों के अनुसार, इस दिन माता सीता का प्रकट होना हुआ था। वैष्णव संप्रदाय में इस दिन व्रत रखने की परंपरा है, जिसमें भक्त श्री राम और माता सीता की पूजा विधिपूर्वक करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन व्रत करने से सोलह महादानों और सभी तीर्थों के दर्शन का फल मिलता है। यह पर्व हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भक्त माता सीता की पूजा-अर्चना करते हैं, जिससे घर में खुशहाली बनी रहती है।
सीता नवमी 2026 का शुभ मुहूर्त
सीता नवमी हर साल वैशाख शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है, और इस वर्ष यह पर्व 25 अप्रैल को आएगा। इस दिन माता जानकी की पूजा का मुहूर्त सुबह 11:20 से दोपहर 01:55 बजे तक रहेगा। विशेष मुहूर्त सुबह 11:01 से 01:38 बजे तक रहेगा, जिससे भक्तों को पूजा के लिए 2 घंटे 37 मिनट का समय मिलेगा।
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
माता सीता को आदर्श स्त्री और नारी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। उनका जीवन धैर्य, समर्पण, सत्य और धर्म के पालन का संदेश देता है। जानकी जयंती या सीता नवमी के दिन लोग विशेष पूजा, हवन, कथा वाचन और भजन-कीर्तन का आयोजन करते हैं। यह दिन नारी शक्ति, मर्यादा और धार्मिक आस्था का प्रतीक है। माता सीता का जीवन हमें सत्संग, त्याग और भक्ति की प्रेरणा देता है।
सीता नवमी पर मंत्रों का जाप
पंडितों के अनुसार, सीता नवमी के दिन माता सीता और श्री राम के मंत्र का 11 बार जाप करना चाहिए। मंत्र इस प्रकार हैं:
1. श्री सीतायै नमः।
2. श्री रामाय नमः।
इन मंत्रों का जाप करके माता सीता और श्री राम को पुष्पांजलि अर्पित करें, जिससे आपके सभी मनोरथ सिद्ध होंगे।
सीता नवमी का उत्सव
सीता जी को जानकी कहा जाता है, क्योंकि उनका जन्म जनकपुरी में हुआ था। जानकी जयंती का पर्व न केवल माता सीता के जन्मदिन के रूप में, बल्कि स्त्री सम्मान और धार्मिक आदर्शों के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।
सीता का चरित्र और मर्यादा
देवी सीता को मर्यादा और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। लंका में रावण की कैद में रहते हुए भी उन्होंने अपनी गरिमा को बनाए रखा। उनका चरित्र यह सिखाता है कि असली शक्ति मन की शुद्धता और इरादों की मजबूती में होती है। सीता नवमी का यह दिन हमें अपने आत्मसम्मान को जगाने और मर्यादा का सम्मान करने की प्रेरणा देता है।
सीता नवमी की पौराणिक कथा
कथा के अनुसार, माता लक्ष्मी जी का अवतार सीता माता अपने पिछले जन्म में मुनि कुषध्वजा की पुत्री वेदावती थीं। वे भगवान विष्णु की भक्त थीं और उनके प्रति समर्पित थीं। रावण ने वेदावती को अपमानित किया, जिसके कारण उन्होंने अग्नि में आत्मदाह करने का प्रण लिया। वेदावती ने कहा कि वह रावण के विनाश का कारण बनेगी। जब वे सीता के रूप में जन्मीं, तो राजा जनक ने उन्हें अपने खेत में पाया और अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया।
सीता नवमी पर पूजा विधि
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धालु माता सीता की मूर्ति या चित्र की पूजा करते हैं। व्रत, कथा पाठ और हवन का आयोजन किया जाता है। पंडितों के अनुसार, शनिवार की सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत-पूजा का संकल्प लें। शुभ मुहूर्त से पहले पूजा की तैयारी कर लें। चित्र पर कुमकुम से तिलक लगाएं, फूलों की माला पहनाएं और शुद्ध घी का दीपक लगाएं। पूजा के बाद फल और अन्य चीजों का भोग भगवान को लगाएं और आरती करें। इस दिन गरीबों को दान देने का भी विशेष महत्व है।
