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हेमकुंड साहिब: एक रहस्यमय तीर्थ यात्रा का इतिहास

हेमकुंड साहिब की तीर्थ यात्रा को कठिनतम में से एक माना जाता है, जो समुद्र तल से 15,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। इस लेख में, हम हेमकुंड के ऐतिहासिक महत्व, लक्ष्मण जी के संबंध और इसके नामकरण की कहानी पर चर्चा करेंगे। जानें कैसे यह स्थान सिख और हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण बन गया है।
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हेमकुंड साहिब: एक रहस्यमय तीर्थ यात्रा का इतिहास

हेमकुंड साहिब की तीर्थ यात्रा

हेमकुंड साहिब की तीर्थ यात्रा को सबसे चुनौतीपूर्ण तीर्थ यात्राओं में से एक माना जाता है। यह गुरुद्वारा समुद्र तल से लगभग 15,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है, और यहां केवल पैदल चलकर ही पहुंचा जा सकता है। भक्त इस कठिन यात्रा को श्रद्धा के साथ पार करते हैं और हेमकुंड साहिब के दर्शन के लिए जाते हैं। इस स्थान का संबंध लक्ष्मण जी से भी जोड़ा जाता है। इस लेख में, हम हेमकुंड के रहस्यमय इतिहास के बारे में जानकारी साझा करेंगे।


हेमकुंड साहिब का ऐतिहासिक महत्व

दसम ग्रंथ में उल्लेख है कि इस स्थान पर सिखों के 10वें गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह ने अपने पिछले जन्म में कठोर तप किया था। यही कारण है कि सिख धर्म में हेमकुंड साहिब का विशेष महत्व है। हिंदू धर्म में भी इस स्थान को महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि मान्यता है कि रामायण काल में लक्ष्मण जी ने यहां ध्यान किया था। यहां लक्ष्मण जी द्वारा स्थापित एक मंदिर भी मौजूद है।


हेमकुंड साहिब की पहचान कैसे बनी

हेमकुंड की खोज के पीछे एक दिलचस्प कहानी है। यह स्थान दो सदियों से अधिक समय तक गुमनाम रहा। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपनी आत्मकथा 'विचित्र नाटक' में इस स्थान का उल्लेख किया था, जिसके बाद यह स्थान पहचान में आया। पंडित तारा सिंह नरोत्तम को हेमकुंड की भौगोलिक स्थिति का पता लगाने वाला सिख माना जाता है। उन्होंने इसे 508 सिख धार्मिक स्थलों में से एक बताया।


हेमकुंड का नामकरण

हेमकुंड एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है 'बर्फ का कटोरा'। इस स्थान का नाम बर्फ से घिरी झील के कारण पड़ा है, जो कटोरे के आकार की है। पहाड़ों से घिरी इस जगह पर एक बड़ा तालाब भी है, जिसे लोकपाल कहा जाता है।