IIMC ने दिल्ली हाई कोर्ट में हिंदी-उर्दू विवाद पर अपना पक्ष रखा
IIMC का आधिकारिक जवाब
नई दिल्ली। भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) ने दिल्ली उच्च न्यायालय में हिंदी-उर्दू विवाद के संदर्भ में अपना आधिकारिक उत्तर प्रस्तुत किया है। इस संस्थान ने प्रवेश परीक्षाओं की लिपि निर्धारित करने के अपने अधिकार का दृढ़ता से समर्थन किया है।
IIMC ने शैक्षणिक स्वतंत्रता का हवाला देते हुए स्पष्ट किया है कि उर्दू पत्रकारिता की परीक्षा को देवनागरी (हिंदी) लिपि में आयोजित करने की मांग को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। संस्थान ने यह भी कहा कि देवनागरी कभी भी उर्दू की लिपि नहीं हो सकती। 20 मई को जारी अदालती नोटिस का जवाब देते हुए, IIMC ने अपने हलफनामे में अपनी कानूनी स्थिति को स्पष्ट किया है।
संस्थान ने संवैधानिक तर्क देते हुए कहा कि संविधान का अनुच्छेद 343, जो देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित करता है, किसी भी याचिकाकर्ता को देवनागरी में उर्दू पत्रकारिता परीक्षा की मांग करने का कानूनी अधिकार नहीं देता। इसके अलावा, IIMC ने यह भी कहा कि ऐतिहासिक परंपराएं आधुनिक संस्थागत मानकों को नहीं बदल सकतीं। उनका मानना है कि उर्दू पत्रकारिता के लिए मूल उर्दू लिपि का ज्ञान होना आवश्यक है, क्योंकि देवनागरी कभी भी उर्दू की लिपि नहीं हो सकती।
कानूनी विवाद का विवरण
क्या है पूरा कानूनी विवाद?
सूत्रों के अनुसार, यह विवाद IIMC के उर्दू पत्रकारिता प्रवेश के लिए दिशानिर्देशों में अचानक बदलाव के कारण उत्पन्न हुआ। 27 अप्रैल को जारी प्रारंभिक अधिसूचना में कहा गया था कि छात्र पीजी डिप्लोमा (उर्दू पत्रकारिता) की परीक्षा उर्दू या देवनागरी में से किसी भी लिपि में दे सकते हैं। लेकिन 6 मई को संस्थान ने एक सुधार अधिसूचना जारी कर देवनागरी के विकल्प को वापस ले लिया और केवल उर्दू लिपि को अनिवार्य कर दिया।
छात्रों की याचिका
छात्रों की याचिका
जिन छात्रों ने पहले नोटिफिकेशन के आधार पर आवेदन फॉर्म और फीस जमा की थी, उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया। छात्रों का कहना है कि नियमों में अचानक बदलाव करना उनके समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन है।
वर्तमान स्थिति
वर्तमान स्थिति
IIMC का मानना है कि प्रशासनिक कारणों से लिए गए आंतरिक निर्णयों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। अब अंतिम निर्णय न्यायपालिका के हाथों में है। वर्तमान में, कोर्ट यह देख रहा है कि नियमों में अचानक बदलाव करना प्रक्रियात्मक रूप से गलत था या यह संस्थान के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आता है।
