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क्या टचस्क्रीन कारें हमारी सुरक्षा के लिए खतरा हैं? जानें विशेषज्ञों की राय

नई कारों में टचस्क्रीन तकनीक का बढ़ता चलन ड्राइविंग के दौरान सुरक्षा को लेकर चिंता पैदा कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये सुविधाएं ड्राइवर का ध्यान भटका सकती हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता है। Euro NCAP ने भी भौतिक बटन की आवश्यकता पर जोर दिया है। जानें इस विषय पर और क्या कहते हैं शोध और विशेषज्ञ।
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क्या टचस्क्रीन कारें हमारी सुरक्षा के लिए खतरा हैं? जानें विशेषज्ञों की राय

नई कारों में टचस्क्रीन का बढ़ता चलन


नई दिल्ली: आजकल की नई कारें बड़े टचस्क्रीन और अत्याधुनिक फीचर्स से लैस हो रही हैं। ये तकनीक देखने में आकर्षक और आधुनिक लगती हैं, लेकिन क्या ये ड्राइविंग के दौरान हमारी सुरक्षा को खतरे में डाल रही हैं? कई शोध और विशेषज्ञों के अनुसार, टचस्क्रीन सुविधाजनक तो है, लेकिन यह ड्राइवर का ध्यान भटकाने का कारण बन सकती है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।


कार निर्माता इसे प्रीमियम अनुभव के रूप में पेश करते हैं, लेकिन सुरक्षा के दृष्टिकोण से इस पर चर्चा कम होती है। सवाल यह है कि क्या हम स्मार्ट कारों के आकर्षण में अपनी सुरक्षा को जोखिम में डाल रहे हैं?


टचस्क्रीन के कारण ध्यान भटकने का खतरा

स्वीडन की एक प्रमुख कार पत्रिका द्वारा किए गए अध्ययन में 11 आधुनिक कारों के टचस्क्रीन और 2005 की Volvo V70 के भौतिक बटन की तुलना की गई। इस अध्ययन में ड्राइवरों को 110 किमी/घंटा की गति से कार चलाते हुए एसी, रेडियो और अन्य नियंत्रणों का संचालन करने के लिए कहा गया।


अध्ययन में यह पाया गया कि टचस्क्रीन वाली कारों में साधारण कार्यों को पूरा करने में 20 सेकंड या उससे अधिक समय लग गया, जबकि भौतिक बटन वाली कारों में यही कार्य 10 सेकंड से भी कम समय में हो गया। इसका कारण यह है कि बटन और नॉब का उपयोग ड्राइवर बिना देखे भी कर सकता है, जबकि टचस्क्रीन के लिए बार-बार सड़क से नजर हटानी पड़ती है।


Euro NCAP की चेतावनी और भौतिक बटन की आवश्यकता

यूरोप की प्रमुख वाहन सुरक्षा एजेंसी Euro NCAP ने भी टचस्क्रीन के उपयोग पर चेतावनी दी है। एजेंसी का कहना है कि भौतिक बटन और नॉब ड्राइविंग के दौरान कम ध्यान भटकाते हैं, क्योंकि इन्हें संचालित करने के लिए आंखें सड़क से नहीं हटानी पड़ती। वहीं, टचस्क्रीन में मेनू नेविगेशन या अन्य कार्यों के लिए पूरा ध्यान देना आवश्यक होता है।


विशेषज्ञों का सुझाव है कि टचस्क्रीन के साथ भौतिक बटन और वॉइस कमांड के विकल्प भी होने चाहिए, ताकि ड्राइवर का ध्यान हमेशा सड़क पर बना रहे। Euro NCAP जैसे मानक जल्द ही ऐसे नियम लागू कर सकते हैं, जिससे कार निर्माता सुरक्षित और उपयोगकर्ता-अनुकूल इंटरफेस डिजाइन करें।


टचस्क्रीन पर शोध

हाल की ट्रांसपोर्ट रिसर्च लैबोरेटरी की स्टडी में यह पाया गया कि टचस्क्रीन का उपयोग करते समय ड्राइवर का रिएक्शन टाइम 57% तक बढ़ सकता है, जो शराब या नशीले पदार्थों के प्रभाव के बराबर माना जाता है। इसका मतलब है कि ड्राइवर सड़क की स्थितियों पर प्रतिक्रिया देने में देर कर सकता है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।


नई कारों में सुरक्षा रेटिंग में बदलाव

Euro NCAP ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में ऐसी कारों को 5-स्टार सुरक्षा रेटिंग देना मुश्किल हो सकता है, जिनमें केवल टचस्क्रीन के जरिए आवश्यक कार्य किए जा रहे हों। हॉर्न, विंडशील्ड वाइपर, टर्न सिग्नल और इमरजेंसी लाइट जैसे कार्यों के लिए भौतिक बटन होना अनिवार्य होगा।


भारत में बढ़ता ट्रेंड

भारतीय बाजार में बड़े टचस्क्रीन वाली कारों का चलन तेजी से बढ़ रहा है। हाल ही में लॉन्च हुई महिंद्रा XUV 7X, बीई 6, टाटा सिएरा, किआ कारेंस और हुंडई क्रेटा जैसी कारों में 10 इंच या उससे बड़े डिस्प्ले दिए जा रहे हैं। कुछ कंपनियां अब फीचर्स की दौड़ में कार से भुगतान करने और हैंड-वेव से दरवाजे खोलने जैसे फैंसी विकल्प भी पेश कर रही हैं।


टचस्क्रीन के फायदे

हालांकि, टचस्क्रीन के कुछ फायदे भी हैं। यह नेविगेशन, कनेक्टिविटी और एंटरटेनमेंट को एक ही स्क्रीन पर नियंत्रित करने की सुविधा प्रदान करती है, जो पारंपरिक बटन सिस्टम से संभव नहीं है। आधुनिक ड्राइविंग अनुभव बेहतर होता है, लेकिन सुरक्षा को ध्यान में रखना अत्यंत आवश्यक है।