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सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई जारी

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुनवाई जारी है। मंदिर प्रशासन ने इस निर्णय का विरोध किया है, जबकि सीनियर एडवोकेट अभिषेक सिंघवी ने महिलाओं के प्रवेश को देवता की पहचान के विपरीत बताया। कोर्ट ने आस्था और सामाजिक सुधार के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। जानें इस मामले में और क्या हो रहा है और सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना है।
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सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई जारी

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर का मामला

नई दिल्ली। सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का मंदिर प्रशासन ने विरोध किया है। सर्वोच्च न्यायालय की नौ जजों की संविधान बेंच इस मामले में पहले के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। बुधवार को इस मामले की सुनवाई का चौथा दिन था। इस दौरान त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (टीडीबी) ने कहा कि यह कोई खिलौने की दुकान या रेस्टोरेंट नहीं है, बल्कि यह एक देवता का मंदिर है जिसे आजन्म ब्रह्मचारी माना जाता है।


मंदिर प्रबंधन का पक्ष रखते हुए सीनियर एडवोकेट अभिषेक सिंघवी ने कहा, '10 से 50 साल की उम्र की महिलाएं देवता के स्वरूप और पहचान के विपरीत हैं। भारत में अयप्पा के लगभग एक हजार मंदिर हैं। यदि महिलाओं को दर्शन करना है, तो वे वहां जा सकती हैं। उन्हें इस विशेष मंदिर में क्यों आना चाहिए?' इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना सबसे कठिन कार्यों में से एक है। साथ ही, यह भी कहा गया कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को कमजोर नहीं किया जा सकता।


यह ध्यान देने योग्य है कि केरल हाई कोर्ट ने 1991 में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे भेदभावपूर्ण मानते हुए इस रोक को हटा दिया। इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गई हैं। सुप्रीम कोर्ट में 50 से अधिक याचिकाओं के आधार पर सात महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर बहस चल रही है। केंद्र सरकार ने पहले अपना पक्ष रखा और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को गलत ठहराया, यह कहते हुए कि मंदिर की परंपरा के अनुसार महिलाओं को प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिए।


बहरहाल, बुधवार को अभिषेक सिंघवी ने कहा कि धार्मिक मामलों में जनहित याचिका से बचना चाहिए, क्योंकि इससे बाहरी लोग परंपराओं में हस्तक्षेप करने लगते हैं। कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या कोई भी व्यक्ति आस्था से जुड़े नियमों को चुनौती दे सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि सामाजिक सुधार आवश्यक है, लेकिन इसके नाम पर धर्म को कमजोर नहीं किया जा सकता। जजों ने स्पष्ट किया कि सुधार और धार्मिक मान्यता के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।