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भारत में क्विक कॉमर्स का उभार: युवा पीढ़ी की नई खरीदारी आदतें

भारत में क्विक कॉमर्स का तेजी से बढ़ता चलन युवा पीढ़ी की खरीदारी आदतों में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला रहा है। अब युवा दो से तीन दिन का इंतजार नहीं करते, बल्कि 10 से 15 मिनट में सामान मंगाने वाले ऐप्स को प्राथमिकता दे रहे हैं। इस लेख में जानें कि कैसे ये ऐप्स न केवल बड़े शहरों में, बल्कि छोटे शहरों में भी लोकप्रिय हो रहे हैं और किस प्रकार ये भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनते जा रहे हैं।
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भारत में क्विक कॉमर्स का उभार: युवा पीढ़ी की नई खरीदारी आदतें

युवाओं की खरीदारी में बदलाव

भारत के बाजारों में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखा जा रहा है, जो मुख्य रूप से युवा पीढ़ी, यानी Gen Z द्वारा प्रेरित है। आज के युवा अब सामान मंगाने के लिए दो से तीन दिन का इंतजार नहीं करते; उनके लिए त्वरित डिलीवरी अब एक स्टेटस सिंबल बन गई है। इस बदलाव के कारण, युवा अब पारंपरिक ऑनलाइन शॉपिंग ऐप्स की बजाय ऐसे क्विक कॉमर्स ऐप्स को प्राथमिकता दे रहे हैं, जो 10 से 15 मिनट में सामान पहुंचाते हैं। मेटा द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह सामने आया है कि 90% लोग इन ऐप्स के बारे में जानते हैं और आधे से अधिक ने हाल ही में इनका उपयोग किया है। इस युवा प्रवृत्ति के चलते, देश का बाजार तेजी से बदल रहा है।


तेजी से बदलती जीवनशैली

आजकल के युवा अपनी व्यस्त जीवनशैली के कारण किसी चीज के लिए लंबा इंतजार नहीं करना चाहते। पहले ऑनलाइन शॉपिंग में सामान आने में दो से तीन दिन लगते थे, लेकिन अब क्विक कॉमर्स ऐप्स इसे कुछ ही मिनटों में पूरा कर देते हैं। युवा अब पहले से योजना बनाकर सामान नहीं खरीदते; वे अपनी तात्कालिक जरूरतों के लिए इन ऐप्स का सहारा लेते हैं, जैसे अचानक भूख लगना या किसी पार्टी के लिए अंतिम समय पर सामान मंगाना। एक रिपोर्ट के अनुसार, बिगबास्केट जैसे प्लेटफार्मों पर नए ग्राहकों में से 50% केवल क्विक कॉमर्स का उपयोग करते हैं, जो महीने में 4 से 15 बार ऑर्डर करते हैं।


ऑनलाइन उपलब्धता का विस्तार

शुरुआत में, इन ऐप्स का उपयोग केवल दूध, ब्रेड और ताजे फल-सब्जियों के लिए किया जाता था, लेकिन अब ब्लिंकिट, स्विगी इंस्टामार्ट और जेप्टो जैसे ऐप्स पर विभिन्न प्रकार के सामान उपलब्ध हैं। अब इन ऐप्स पर मेकअप उत्पाद, क्रीम, मोबाइल चार्जर, ईयरफोन, स्टेशनरी, खिलौने और कपड़े भी आसानी से मिल जाते हैं। वर्तमान में, राशन के अलावा अन्य सामानों की बिक्री में हिस्सेदारी 15% से 20% तक पहुंच गई है। ये प्लेटफार्म स्थानीय दुकानों की तुलना में 10% से 15% सस्ते दाम पर सामान उपलब्ध कराते हैं।


डिलीवरी की प्रक्रिया

इन तेज डिलीवरी सेवाओं के पीछे कंपनियों का एक विशाल नेटवर्क कार्यरत है। ये कंपनियां शहरों के विभिन्न क्षेत्रों में छोटे गोदाम बनाती हैं, जिन्हें डार्क स्टोर्स कहा जाता है। ब्लिंकिट जैसी कंपनियों की वैल्यूएशन लगभग 13 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई है। इन कंपनियों के पास ऐसे कंप्यूटर सिस्टम होते हैं जो पहले से ही अनुमान लगाते हैं कि किस क्षेत्र में किस समय किस सामान की मांग अधिक होगी। इसलिए, वे आवश्यक सामान को पहले से ही इन छोटे गोदामों में तैयार रखते हैं। जैसे ही ग्राहक ऑर्डर करते हैं, नजदीकी डिलीवरी बॉय तुरंत सामान लेकर निकलता है और समय पर पहुंचा देता है।


छोटे शहरों में बढ़ती लोकप्रियता

क्विक कॉमर्स की यह वृद्धि अब केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि टियर 2 शहरों जैसे विशाखापत्तनम, नागपुर, कोच्चि, जयपुर और लखनऊ में भी लोग इसे तेजी से अपना रहे हैं। एक औसत भारतीय परिवार अपने राशन खर्च का 5% से 6% हिस्सा इन क्विक कॉमर्स ऐप्स पर खर्च कर रहा है। इस क्षेत्र में लाभ देखकर, कपड़े और लाइफस्टाइल ब्रांड्स भी इस बाजार में कदम रख रहे हैं। उदाहरण के लिए, मिन्त्रा ने बेंगलुरु में दो घंटे के भीतर कपड़े डिलीवर करने के लिए 'M-Now' प्रोजेक्ट शुरू किया है। इसी तरह, जोमैटो जैसी कंपनियां भी तेजी से खाना पहुंचाने के लिए अपने नेटवर्क का विस्तार कर रही हैं। इस प्रतिस्पर्धा से स्पष्ट है कि भविष्य में यह तेज डिलीवरी प्रणाली भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाएगी।