नई बहू की पहली होली: ससुराल में क्यों नहीं मनाते हैं रंग?
पहली होली का महत्व और परंपरा
होली का त्योहार रंगों और खुशियों का प्रतीक है, जिसमें सभी उम्र के लोग एक-दूसरे पर रंग डालते हैं। हालांकि, शादी के बाद नई बहू को ससुराल में होली खेलने की अनुमति नहीं होती। इसके बजाय, उसे अपने मायके जाकर पहली होली मनाने के लिए कहा जाता है। यह परंपरा आज भी कई परिवारों में जीवित है। क्या आपने कभी सोचा है कि इसके पीछे क्या कारण है? आइए इस रिवाज की गहराई में जाते हैं, इसके पौराणिक संदर्भ और सामाजिक मान्यताओं को समझते हैं।
होलिका दहन की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, होलिका ने प्रह्लाद को जलाने के लिए विशेष वस्त्र पहनकर अग्नि में प्रवेश किया। लेकिन जब आग भड़की, प्रह्लाद ने भगवान का नाम लेना शुरू किया, जिससे वह वस्त्र होलिका से हटकर प्रह्लाद पर आ गया और होलिका जल गई। होलिका के जलने के अगले दिन उसकी शादी तय थी। उसकी सास ने बहू की जलती हुई चिता देखकर दुख से प्राण त्याग दिए। इस घटना के बाद से यह मान्यता बनी कि नई बहू को ससुराल में पहली होली जलती हुई नहीं देखनी चाहिए।
सास-बहू के रिश्ते में सामंजस्य
कहा जाता है कि यदि बहू अपनी पहली होली ससुराल में सास के साथ मनाती है, तो उनके रिश्ते में तनाव आ सकता है। इस परंपरा के अनुसार, बहू को पहली होली अपने मायके में मनानी चाहिए, ताकि सास-बहू के बीच का रिश्ता सौहार्दपूर्ण बना रहे।
सम्मान और संवेदनशीलता
नई बहू की पहली होली को सम्मान और आदर से भी जोड़ा जाता है। यदि वह अपने पति के साथ रंग खेलती है, तो घर के बड़े-बुजुर्गों को असहजता महसूस हो सकती है। इसलिए, बहू को मायके भेजा जाता है और दामाद को ससुराल में होली मनाने के लिए कहा जाता है। कुछ स्थानों पर यह भी माना जाता है कि शादी के बाद पहली होली के समय बहू को अपने मायके की याद आती है, इसलिए उसे मायके भेजना एक संवेदनशील कदम है। गर्भवती महिलाएं भी अपनी पहली होली मायके में मनाती हैं।
Disclaimer: ये सामान्य समाज के मान्यताओं पर आधारित है, JBT इसकी पुष्टि नहीं करता.
