भारत में सिजेरियन प्रसव की बढ़ती प्रवृत्ति: स्वास्थ्य पर प्रभाव
सिजेरियन प्रसव की बढ़ती संख्या
नई दिल्ली: भारत में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के विकास के साथ, प्राकृतिक प्रसव से जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या में निरंतर कमी देखी जा रही है। इसके विपरीत, सिजेरियन ऑपरेशन (सी-सेक्शन) के मामलों में एक चौंकाने वाली वृद्धि हो रही है। यह परिवर्तन न केवल चिकित्सा क्षेत्र के लिए, बल्कि भविष्य की पीढ़ी के स्वास्थ्य के लिए भी कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है।
राज्यों में सिजेरियन प्रसव की दर
हालिया स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े दर्शाते हैं कि जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना जैसे राज्यों के निजी अस्पतालों में सिजेरियन प्रसव की दर अत्यधिक बढ़ गई है। इन राज्यों में क्रमशः 90%, 87.7% और 84% बच्चों का जन्म ऑपरेशन के माध्यम से हुआ है। इसी तरह, आंध्र प्रदेश में 66%, असम में 81.4% और ओडिशा में 76.8% प्रसव सी-सेक्शन से हुए हैं।
पिछले दो दशकों में वृद्धि
यदि हम पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर ध्यान दें, तो यह वृद्धि अत्यधिक तेज रही है। वर्ष 2005-06 में केवल 8.5% बच्चों का जन्म सिजेरियन से हुआ, जो 2015-16 में बढ़कर 17.2% हो गया। इसके बाद 2019-21 में यह आंकड़ा 21.5% तक पहुंच गया और अब कुल डिलीवरी का एक चौथाई से अधिक हिस्सा (27.2%) सी-सेक्शन के अंतर्गत आ चुका है।
लेबर पेन का डर
इस बदलाव का मुख्य मनोवैज्ञानिक कारण महिलाओं में नॉर्मल डिलीवरी के दौरान होने वाले लेबर पेन का अत्यधिक डर है। गर्भवती महिलाएं अक्सर अपने परिवार की अनुभवी महिलाओं या रिश्तेदारों से इस दर्द के बारे में सुनती हैं, जिससे उनका मनोबल कमजोर हो जाता है और वे सिजेरियन का विकल्प चुनने लगती हैं।
सुरक्षा की चिंताएं
दर्द के अलावा, नवजात शिशु की सुरक्षा को लेकर परिवार के लोग भी चिंतित रहते हैं। वे प्रसव के दौरान किसी भी प्रकार की अनहोनी से बचने के लिए डॉक्टरों पर ऑपरेशन का दबाव डालते हैं। इसके साथ ही, सी-सेक्शन में समय और तारीख तय करने की सुविधा भी होती है, जिससे लोग इसे प्राथमिकता देने लगे हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि प्रसव का तरीका केवल व्यक्तिगत पसंद या डर के आधार पर नहीं होना चाहिए। यदि मां या बच्चे के जीवन को कोई वास्तविक खतरा है, तो सिजेरियन एक सुरक्षित विकल्प हो सकता है। लेकिन, केवल दर्द से बचने के लिए इस प्रक्रिया का सहारा लेना उचित नहीं है और सही चिकित्सा सलाह को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
