मकर संक्रांति: पतंग उड़ाने की परंपरा और इसके पीछे का इतिहास
मकर संक्रांति का महत्व
तिल और गुड़ से बनी मिठाइयाँ और आसमान में उड़ती रंग-बिरंगी पतंगें मकर संक्रांति का अभिन्न हिस्सा हैं। इनके बिना यह त्योहार अधूरा सा लगता है। यह उत्सव विशेष रूप से दिल्ली और गुजरात में धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन भारत के अन्य शहरों में भी पतंग उड़ाने की परंपरा देखने को मिलती है। मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा भगवान राम के समय से चली आ रही है और इसका संबंध मुगल काल से भी है।
पतंग उड़ाने का धार्मिक महत्व
मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएँ हैं। तमिल रामायण के अनुसार, भगवान राम ने पहली बार मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाई थी। कहा जाता है कि उनकी पतंग इतनी ऊँची उड़ गई कि वह इंद्रलोक तक पहुँच गई। इसी कारण से मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा की शुरुआत हुई।
रामचरितमानस में उल्लेख
रामचरितमानस के बाल कांड में तुलसीदास ने भगवान राम के पतंग उड़ाने का उल्लेख किया है।
‘राम इक दिन चंग उड़ाई।
इंद्रलोक में पहुँची जाई।’
पतंग उड़ाने का वैज्ञानिक पहलू
मकर संक्रांति के आस-पास ठंड कम होने लगती है। पतंग उड़ाने से लोग सर्दियों में सूरज की किरणों का स्वागत करते हैं, जिससे शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है, क्योंकि सूरज की रोशनी से विटामिन डी मिलता है। सर्दियों की सुबह पतंग उड़ाने से शरीर में ऊर्जा आती है और त्वचा की बीमारियों में राहत मिलती है।
पतंग उड़ाने का ऐतिहासिक सफर
पतंग उड़ाने की परंपरा लगभग 2000 साल पुरानी है। इसकी शुरुआत चीन में हुई थी, जहाँ पतंगों का उपयोग संदेश भेजने के लिए किया जाता था। भारत में पतंगें चीनी यात्रियों फा शियान और ह्वेनसांग के माध्यम से आईं। प्रारंभ में, युद्ध के मैदान में संदेश भेजने के लिए पतंगों का इस्तेमाल किया जाता था। मुगलों ने दिल्ली में पतंग उड़ाने की प्रतियोगिताएँ आयोजित कीं, और धीरे-धीरे यह खेल भारतीय घरों में लोकप्रिय हो गया।
