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1925 का दशहरा: नागपुर में भगवा ध्वज का इतिहास और उसका अर्थ

1925 में नागपुर में दशहरा के अवसर पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा भगवा ध्वज की स्थापना की गई, जो आज के भारत में एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया है। इस लेख में हम जानेंगे कि कैसे इस ध्वज का अर्थ और महत्व समय के साथ बदल गया है। क्या यह केवल एक राजनीतिक प्रतीक बनकर रह गया है, या इसके पीछे गहरे धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थ छिपे हैं? जानें इस ऐतिहासिक घटना के प्रभाव और वर्तमान संदर्भ में इसके महत्व के बारे में।
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1925 का दशहरा: नागपुर में भगवा ध्वज का इतिहास और उसका अर्थ

नागपुर का ऐतिहासिक क्षण

1925 में नागपुर में दशहरा मनाया जा रहा था, जब डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने मोहिते बाड़ा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली शाखा की स्थापना की। उस समय यह स्थान भूतहा माना जाता था, लेकिन हेडगेवार ने वहां भगवा झंडा फहराया। उस शाखा में शामिल 20-25 लड़कों ने सनातन धर्म के गेरूआ ध्वज के महत्व को समझने की आवश्यकता नहीं समझी। संघ के मुखपत्र 'ऑर्गेनाइजर' में उल्लेख किया गया है कि जब अंग्रेजों को इस शाखा की जानकारी मिली, तो उन्होंने हेडगेवार के मित्र राजसाहेब लक्ष्मणराव भोसले को बुलाया। भोसले ने कहा कि उनके यहां शिवाजी का झंडा फहराया जाता है, और यह भी उसी ध्वज के नीचे किया जाता है।


भगवा ध्वज का अर्थ

हालांकि, न तो अंग्रेजों ने पूछा और न ही भोसले ने बताया कि जिस झंडे के आगे वंदना की जा रही है, उसमें मातृभूमि से पहले सनातन धर्म और हिंदवी स्वराज का महत्व है। हेडगेवार और गोलवलकर ने त्याग और निःस्वार्थता की बातें तो कीं, लेकिन उन्होंने अपने स्वयंसेवकों को केवल लाठी और गणवेश धारण करने का ज्ञान दिया। क्या यह सौ वर्षों का सार नहीं है?


आज का भारत और भगवा

1925 के उस स्थान का श्राप शायद आज के भारत पर भी है, जहां नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे स्वयंसेवक हैं। आज का भारत न तो शिवाजी का हिंदवी स्वराज है और न ही सनातन धर्म की पवित्रता को दर्शाता है। 5 मई 2026 को बंगाल में भगवामय होने की खबरों ने यह सवाल उठाया कि यह कौन सा भगवा है?


सनातन धर्म की परिभाषा

सनातन धर्म के शास्त्रीय ग्रंथों में भगवा का अर्थ त्याग, पवित्रता और वैराग्य है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि गेरुआ वस्त्र त्याग का ध्वज है। जो व्यक्ति गेरुआ ध्वज धारण करता है, वह शुभ और पावन होना चाहिए।


राजनीतिक संदर्भ

हालांकि, नरेंद्र मोदी और अमित शाह कह सकते हैं कि यह सब फिजूल की बातें हैं। वे भारत को पापमुक्त और मुसलमान-मुक्त बनाने का दावा करते हैं। लेकिन क्या वे भगवा के नाम पर ठगी का सहारा लेकर असली राष्ट्रधर्म का पालन कर रहे हैं?


निष्कर्ष

1925 के नागपुर में भगवा ध्वज के रोपण से जो अनर्थ हुआ है, क्या हमें भगवा धर्म की एक नई परिभाषा नहीं लिखनी चाहिए?