भक्ति, साहित्य और राष्ट्रीय चेतना की अमूल्य धरोहर श्री कामता सखी मठ का मनाया गया 108वां वार्षिकोत्सव
छपरा, 03 जनवरी (हि.स.)। बिहार के छपरा जिला में स्थ्त श्री कामता सखी मठ का आज (शनिवार को ) पौष पूर्णिमा के पावन अवसर पर 108वां वार्षिकोत्सव श्रद्धा, भक्ति और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया जा रहा है। इस अवसर पर मठ परिसर में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और संत-स्मरण का आयोजन किया गया है।
मठ परिवार के अनुसार, यह वार्षिकोत्सव केवल एक धार्मिक पर्व भर नहीं है, बल्कि संत-कवि महात्मा कामता सखी की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत, उनके सामाजिक संदेश और राष्ट्रीय महत्व को याद करने का पावन अवसर है। यह आयोजन संत परंपरा के मूल्यों, लोकभाषा साहित्य और सामाजिक समरसता के संदेश को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी माध्यम बन रहा है।
वास्तव में छपरा शहर के उत्तरी दहियावां टोला में स्थित श्री कामता सखी मठ न केवल एक ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह भक्ति, लोकभाषा साहित्य, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक चेतना का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी है। वर्ष 1919 में महान तपस्वी, संत-कवि महात्मा कामता सखी द्वारा स्थापित यह मठ आज भी श्रद्धालुओं की आस्था और संस्कृति की अमूल्य धरोहर के रूप में विद्यमान है।
श्रद्धालुओं की अटूट आस्था
यहां दूर-दूर से भक्तजन संत की समाधि के दर्शन, चादर चढ़ाने, मन्नत मांगने और माथा टेकने आते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से यहां की गई प्रार्थनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं। इसी आस्था के कारण यह मठ वर्षों से श्रद्धालुओं का प्रमुख तीर्थ बना हुआ है।
संत कामता सखी का जीवन और साधना
संत श्री कामता सखी का जन्म 16 दिसंबर 1885 को सिवान जिले के बसंतपुर थाना क्षेत्र के सिकटिया गांव में हुआ था। उनके पिता मुंशी महेन्द्र लाल और माता रामकली देवी थीं। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने छपरा कॉलेजिएट स्कूल में शिक्षक के रूप में कार्य किया। आत्मज्ञान की प्राप्ति के पश्चात उन्होंने सांसारिक मोह-माया का त्याग कर संत जीवन अपनाया और छपरा में कुटिया बनाकर साधना में लीन हो गए।
उनके पुत्र अविनाशी सखी भी भोजपुरी के महान संत-कवि बने और उन्होंने वर्ष 1990 में इसी आश्रम परिसर में समाधि ली।
भोजपुरी साहित्य को अमूल्य योगदान
महात्मा लक्ष्मी सखी द्वारा कैथी लिपि में रचित पुस्तक ‘ग्रंथरामजी’ को महात्मा कामता सखी ने चार भागों—अमर सीढ़ी, अमर कहानी, अमर विलास और अमर फारस में विभाजित कर भोजपुरी भाषा में प्रसिद्ध किया। इन ग्रंथों में लगभग चार हजार भजन संकलित हैं, जिनमें होली, चैता, चातुर्मास, झुलना, सोहर, विवाह-गारी, निर्गुण शब्द और अन्य लोक विधाओं का समृद्ध वर्णन मिलता है।
महात्मा कामता सखी ने 24 जुलाई 1964 को अपनी इच्छा शक्ति से समाधि ली। उन्होंने अपने जीवनकाल में ही पौष पूर्णिमा के दिन इन ग्रंथों की पूजा परंपरा प्रारंभ की थी, जो आज भी सखी संप्रदाय के सभी मठों में श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के आध्यात्मिक गुरु
महात्मा कामता सखी भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के आध्यात्मिक गुरु भी थे। वर्ष 1962-63 के दौरान पटना से लिखे गए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के पत्र आज भी श्री कामता सखी मठ में सुरक्षित रखे गए हैं। इन पत्रों में उन्होंने संत सान्निध्य को अपनी आंतरिक शक्ति, धैर्य और आध्यात्मिक संबल का स्रोत बताया है।
धार्मिक ही नहीं, राष्ट्रीय चेतना का भी केंद्र
श्री कामता सखी मठ केवल धार्मिक आस्था का स्थल नहीं, बल्कि यह नैतिक मूल्यों, सामाजिक संदेश और राष्ट्रीय चेतना के प्रसार का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
पौष पूर्णिमा पर 108वां वार्षिकोत्सव
आज 3 जनवरी 2026 (शनिवार) को पौष पूर्णिमा के पावन अवसर पर मठ का 108वां वार्षिकोत्सव श्रद्धा, भक्ति और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया जा रहा है। यह आयोजन केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि संत-कवि महात्मा कामता सखी की आध्यात्मिक विरासत, सामाजिक योगदान और राष्ट्रीय महत्व को स्मरण करने का पावन अवसर है। यह वार्षिकोत्सव संत परंपरा, लोकसंस्कृति और आध्यात्मिक चेतना को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी सशक्त माध्यम बन रहा है।---------------
हिन्दुस्थान समाचार / सुरभित दत्त
