आधुनिकीकरण की धुन में खो रही फागुन की गूंज, गांवों से गायब हो रहे पारंपरिक होली गीत
सुपौल, 26 फ़रवरी (हि.स.)। कभी गांवों की चौपालों पर गूंजने वाले पारंपरिक फाग गीत, जोगीरा और नगाड़ों की थाप अब धीरे-धीरे इतिहास बनते जा रहे हैं। उनकी जगह आधुनिक डीजे और तेज लाउडस्पीकर ने ले ली है। बदलती जीवनशैली और आधुनिकीकरण की तेज रफ्तार ने होली के पारंपरिक रंग को फीका कर दिया है।
पहले बसंत पंचमी से ही गांवों में फागुनी माहौल बनना शुरू हो जाता था। शाम ढलते ही चौपालों पर बुजुर्ग और युवा एकत्र होकर ढोलक, मंजीरा और नगाड़ों की थाप पर फाग गाते थे। जोगीरा की तुकबंदियों से पूरा वातावरण ठहाकों और उमंग से भर उठता था। होली केवल एक दिन का त्योहार नहीं, बल्कि पूरे महीने चलने वाला सांस्कृतिक उत्सव हुआ करता था, जिसमें गांव की सामूहिक भागीदारी दिखती थी लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। गांवों में भी डीजे संस्कृति का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की जगह इलेक्ट्रॉनिक धुनों ने ले ली है। युवा पीढ़ी लोकगीतों की बजाय फिल्मी और पॉप गानों पर झूमना अधिक पसंद कर रही है। परिणामस्वरूप फाग, जोगीरा और पारंपरिक होली गायन की परंपरा सिमटती जा रही है।
ग्रामीण बुजुर्गों का कहना है कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, आपसी मेल-जोल और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक रही है। फाग और जोगीरा केवल गीत नहीं थे, बल्कि व्यंग्य, संवाद और सामाजिक समरसता का माध्यम भी थे। इनके माध्यम से समाज की छोटी-बड़ी बातों को हंसी-ठिठोली में कह दिया जाता था, जिससे रिश्तों में मिठास बनी रहती थी।
सांस्कृतिक जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते लोक परंपराओं को संरक्षित करने के प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाली पीढ़ियां इन सांस्कृतिक धरोहरों से पूरी तरह अनजान रह जाएंगी। जरूरत है कि स्कूलों, सामाजिक संस्थाओं और ग्राम सभाओं के माध्यम से पारंपरिक होली गीतों, फाग प्रतियोगिताओं और लोक वाद्ययंत्रों के कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाए।होली का असली रंग तभी बरकरार रह पाएगा, जब आधुनिकता के साथ-साथ परंपरा की मिठास भी सहेज कर रखी जाए।
हिन्दुस्थान समाचार / विनय कुमार मिश्र
