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प्राकृतिक खेती को लेकर किसानो को दिया गया तीन दिवसीय प्रशिक्षण

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प्राकृतिक खेती को लेकर किसानो को दिया गया तीन दिवसीय प्रशिक्षण


प्राकृतिक खेती को लेकर किसानो को दिया गया तीन दिवसीय प्रशिक्षण


प्राकृतिक खेती को लेकर किसानो को दिया गया तीन दिवसीय प्रशिक्षण


पूर्वी चंपारण,03 जनवरी (हि.स.)। जिले के परसौनी कृषि विज्ञान केंद्र के तत्वाधान में प्राकृतिक खेती को बढावा देने के लिए किसानो को तीन दिवसीय प्रशिक्षण दिया गया।

पहाड़पुर प्रखंड के बलुआ गांव में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में केन्द्र के मृदा विशेषज्ञ डॉ आशीष राय ने किसानों को प्राकृतिक खेती के विभिन्न घटकों के बारे में विस्तार से बताया। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में मुख्य रूप से युवा किसानों को प्रशिक्षित किया गया। प्रशिक्षण के पहले दिन किसानों को जीवामृत पंचगव्य, घनामृत और नीमस्त्र के बारे में बताया गया जिसमें किसानो को जैविक खाद और कीटनाशी को अपने घर पर ही बनाने और खेतों में इसके उपयोग करने के तरीके बताये गये। प्रशिक्षण के दूसरे व तीसरे दिन किसान भाइयों को जीवामृत, पंचगव्य, नीमस्त्र और घनामृत के लगने वाले विभिन्न उत्पादों और उसे सजीव बनाने का तरीका बताया गया।

-जीवामृत में लगने वाले मुख्य उत्पाद

देसी गाय का गोबर, गोमूत्र, बेसन, गुड, और उपजाऊ मिट्टी, प्लास्टिक का ड्रम छायादार स्थान में रख करके सर्वप्रथम ड्रम को आधा पानी भर के उसमें गोबर को डालकर के घोला जाता है, उसके बाद गोमूत्र को डाल करके घोला जाता है, फिर बेसन को डाला जाता है और अंत में गुड का छोटा-छोटा टुकड़ा मिट्टी में मिलाकर के डाल दिया जाता है और फिर इसको डंडे से हिला करके बढ़िया से मिक्स करके ड्रम को ढक दिया जाता है और अगले दिन इसमें थोड़ा सा पानी और मिलाते हैं, और ड्रम को पूरा नहीं भरते हैं थोड़ा जगह ऊपर से छोड़ देते हैं इस प्रकार 8 से 10 दिन सुबह शाम ड्रम को लकड़ी के डंडे से बढ़िया से इस घोल को मिलाते रहते हैं और फिर जीवामृत तैयार हो जाता है।

-पंचगव्य बनाने के विभिन्न उत्पाद और तरीका

पंचगव्य बनाने के लिए गाय के पांच उत्पाद जैसे गाय का गोबर, गोमूत्र, दूध, दही और देशी घी इन सब को इकट्ठा करके एक ड्रम में आधा पानी भरते हैं और उसमें सर्वप्रथम गोबर को मिलाते हैं फिर उसमें गोमूत्र डालकर के उसको मिक्स करते हैं उसके बाद दूध डालते हैं फिर दही और घी को एक साथ मिलाकर उसके पेस्ट को उसमें डालते हैं और बढ़िया से घोल लेते हैं फिर इसको भी 8 से 10 दिन तक लगातार छायादार स्थान में रखकर हल्की धूप और हल्की हवा लगने देते हैं और सुबह और शाम इसको मिलाते रहते हैं फिर जब यह तैयार हो जाता है तो इसका उपयोग कर सकते हैं।

-नीमस्त्र बनाने के लिए विभिन्न उत्पाद

पौधों में लगने वाले विभिन्न प्रकार के कीड़ों को रोकथाम के लिए देसी प्रकार से नीमस्त्र को तैयार कर सकते हैं और इसके लिए हरे नीम के पत्ते, लहसुन, हरी मिर्च, अदरक का इस्तेमाल कर सकते हैं। सर्वप्रथम नीम के पत्ते को बढ़िया से पीस करके एक प्लास्टिक की बाल्टी में पानी से घोल बना लें फिर उसमें लहसुन का थोड़ा सा पेस्ट डालें उसको बढ़िया से मिला लें और उसके बाद अदरक का थोड़ा सा पेस्ट डाल करके बढ़िया से मिला लें फिर अंत में हरी मिर्च का पेस्ट डाल करके पूरे घोल को एक साथ मिला लें और थोड़ी देर के लिए उसको मिलाते रहे जब यह बढ़िया से मिल जाए तो इसको सूती कपड़े से प्लास्टिक के कंटेनर में छान करके रख लें और इस्तेमाल कर सकते हैं।

इस अवसर पर कृषि विज्ञान केंद्र परसौनी के वरीय वैज्ञानिक और प्रधान डॉ अभय कुमार सिंह ने किसानों को बताया कि सब्जी की खेती में प्राकृतिक खेती की अपार संभावनाएं हैं और किसान भाई सब्जी के खेती में पंचगव्य, जीवअमृत, नीमस्त्र, घनामृत आदि का उपयोग करके कम लागत में अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं और पेस्टिसाइड और इंसेंक टिसाइड के उपयोग की जगह नीमास्त्र का उपयोग करके हानिकारक कीट पतंग से फसलो की रक्षा कर सकते हैं।इससे पौष्टिक व स्वास्थ्यवर्धक सब्जी का उत्पादन कर सकते हैं।

कृषि विज्ञान केंद्र परसौनी के कृषि अभियांत्रिकी वैज्ञानिक डॉ अंशु गंगवार ने किसानों को बताया कि कैसे पंचगव्य, जीवामृत और नीमस्त्र का उपयोग फलों सब्जियों और पौधों पर करें इसके लिए स्प्रेयर का उपयोग कर सकते हैं, नाली में पानी जाने वाले रास्ते का उपयोग कर सकते हैं या खेत की तैयारी करते समय सीधे खेत में इसका छिड़काव करके उपयोग कर सकते हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / आनंद कुमार