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सामने आया सच-माओवाद और कन्वर्जन के लिए खाद का काम करता है विदेशी चंदा

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सामने आया सच-माओवाद और कन्वर्जन के लिए खाद का काम करता है विदेशी चंदा


सामने आया सच-माओवाद और कन्वर्जन के लिए खाद का काम करता है विदेशी चंदा


-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

रायपुर, 02 मई (हि.स.)। विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। सरकार इसे पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय सुरक्षा का जरूरी औजार बता रही है, जबकि चर्च-समर्थित संस्थाएं, कुछ अल्पसंख्यक संगठन और कांग्रेस समेत विपक्ष इसे संस्थागत स्वतंत्रता पर हमला करार दे रहे हैं।

25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किए गए विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को सरकार ने अभी तक पूरी तरह वापस नहीं लिया है, लेकिन विपक्षी दलों के भारी विरोध के बाद इसके पारित होने की प्रक्रिया को स्थगित कर दिया गया है। विपक्षी नेताओं द्वारा इसे पूरी तरह से वापस लेने की मांग की जा रही है। मगर इसे लेकर मोदी सरकार का अपना पक्ष है। सरकार की ओर से अब तक विभिन्न केंद्रीय मंत्रियों एवं अन्य भाजपा संगठन से जुड़े पदाधिकारियों की ओर से यही बताया गया है कि देश विरोधी शक्तियों, आन्दोलनों, माओवाद और कन्वर्जन के लिए खाद के रूप में इस्तेमाल होता आया एफसीआरए (चंदा) अब वास्तविक समाज सेवा के कार्य में लगे, केंद्र सरकार यही प्रयास कर रही है।

दूसरी ओर कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ़्रेंस ऑफ़ इंडिया (सीबीसीआई) जोकि देश के सबसे बड़े ईसाई बिशप‑संगठनों में से एक है, वह इस विधेयक को “अल्पसंख्यक संस्थाओं और एनजीओ के अस्तित्व पर संकट” बता रहा है। फिर ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन (एआईसीयू) का भी यही हाल है। ये एक ईसाई समुदाय का एक बड़ा नागरिक‑प्रतिनिधि संगठन है। इसका तर्क है कि विधेयक के तहत सरकार चर्च‑चर्च‑संचालित संस्थाओं की संपत्ति पर हस्तक्षेप कर सकती है, जो धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है।

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल), के कुछ सांसद-नेता ने विधेयक को अल्पसंख्यक संस्थाओं के खिलाफ दबाव बताते हुए आपत्ति जताई है। ईटी मोहम्मद बशीर (आईयूएमएल‑संबद्ध सांसद) जैसे नेताओं ने सार्वजनिक बयान में इस विधेयक के मुस्लिम‑आधारित एनजीओ और सामाजिक‑शैक्षणिक संस्थाओं पर नकारात्मक प्रभाव की चेतावनी दी है। केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में कुछ मुस्लिम‑समुदाय‑आधारित शैक्षणिक‑सामाजिक संस्थाएं और एनजीओ ने विधेयक को “अल्पसंख्यक संस्थाओं के लिए खतरा” बताया है।

इस संदर्भ में विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल कहते हैं, “इस पूरे विवाद के बीच एक बुनियादी सवाल मेरे मन में उभर रहा है, जब हजारों अन्य सामाजिक, धार्मिक और शैक्षणिक संस्थाएं इसी कानून के तहत काम कर रही हैं और उन्हें संशोधन से कोई भय नहीं, तब फिर विरोध की यह तीव्रता आखिर किस बात का संकेत है? क्या यह वास्तव में अधिकारों की लड़ाई है या इसके पीछे कहीं गहरे वैचारिक, राजनीतिक और वित्तीय हित जुड़े हुए हैं?”

बंसल का कहना है, “देश में बहुसंख्यक हिन्दू हैं, स्वभाविक है, उनके ही सबसे अधिक शिक्षण संस्थान, समाजसेवी एनजीओ, धार्मिक ट्रस्ट व अन्य संस्थान हैं, उन्हें केंद्र सरकार के द्वारा इस एफसीआरए के नियम संशोधन पर कोई आपत्ति नहीं, जैन, बौद्ध एवं सिख समाज के भी कई संगठन हैं, उनकी कोई आपत्ति नहीं है। तब फिर सबसे अधिक चर्च से जुड़े ईसाई मिशनरी संस्थान क्यों विरोध कर रही हैं, फिर कुछ इस्लामिक संस्थाएं हैं, जोकि इन नए नियमों के विरोध में हैं, आखिर क्यों? क्या वे अब तक कुछ गलत करते रहे हैं, जिसके बंद हो जाने का डर उन्हें सता रहा है!”

वे आगे कहते हैं कि “मैं उन सभी से पूछना चाहता हूं, जो विरोध में हैं कि जब आपको सभी कार्य नियम से पूरे करने हैं, फिर डर क्यों सता रहा है, इसका अर्थ तो यही हुआ कि कहीं विदेशी चंदे का उपयोग गलत कार्यों में असंविधानिक कार्यों में हो रहा है, जिसके पकड़े जाने का डर है!”

छत्तीसगढ़ में माओवाद और नक्सलवाद के उभरने के क्या समाज जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, इस विषय पर लम्बे समय से कार्य कर रही अध्येता एवं वरिष्ठ पत्रकार प्रियंका कौशल ने कहा, “देश में कन्वर्जन और माओवादी नक्सली गतिविधियां और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनी हुई सरकार के खिलाफ माहौल पैदा करना इस विदेशी चंदे से अब तक कई बार सामने आ चुका है। अब ताजा उदाहरण ही देखें, भारत सरकार ने उच्चतम न्यायालय को बताया है कि विकास कार्यों के लिए विदेश से प्राप्त फंड का अक्सर माओवादियों (नक्सलियों) को प्रशिक्षित करने और उनके द्वारा उपयोग की जाने वाली गतिविधियों में विचलन (डायवर्ट) किया जाता है।”

उन्होंने अपने राज्य में पिछले माह सामने आए प्रकरण द टिमोथी इनिशिएटिव की जांच, जिसमें कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 'द टिमोथी इनिशिएटिव' नामक एक वैश्विक ईसाई मिशन की जांच की, जोकि नक्सल प्रभावित रहे क्षेत्रों (जैसे छत्तीसगढ़ का बस्तर और धमतरी) में विदेशी डेबिट कार्ड के माध्यम से करोड़ रुपये की संदिग्ध निकासी से जुड़ी थी, का हवाला देते हुए कहा कि यह संस्था एफसीआरए पंजीकृत नहीं थी और इसने कथित तौर पर 95 करोड़ रुपये का विदेशी फंड अवैध रूप से प्राप्त किया, जिसका उपयोग माओवादी हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में हुआ।

उन्होंने कहा, “एन्वायरोनिक्स ट्रस्ट का मामला (2024) में सामने आया ही था, जिसमें कि सीबीआई ने एन्वायरोनिक्स ट्रस्ट पर ओडिशा में 'अम्फान' चक्रवात के राहत फंड के नाम पर विदेशी चंदा प्राप्त करने और उसका उपयोग जेएसडब्ल्यू स्टील परियोजना के खिलाफ प्रदर्शनों में करने का आरोप लगाया है। यह भी कहा गया है कि इसका संबंध नक्सली विचारधारा वाले तत्वों से था।”

प्रियंका अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं, “जांच एजेंसियों ने पाया है कि कुछ मामलों में प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) के नेताओं को व्यवसायों या ठेकेदारों से जबरन वसूली के माध्यम से और एनजीओ के माध्यम से भी धन मिला है, जिसे बाद में हथियार खरीदने और आतंकी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया गया। गृह मंत्रालय ने टुटिकोरिन डायोसीज़न एसोसिएशन और सेंटर फॉर प्रमोशन एंड सोशल कन्सर्न जैसे एनजीओ के एफसीआरए पंजीकरण को निलंबित कर दिया है, क्योंकि उनकी गतिविधियां कथित तौर पर राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने में पाई गई थीं। इस तरह के अन्य भी कई मामले अब तक सामने आ चुके हैं, जोकि कन्वर्जन, देशविरोधी गतिविधियों से जुड़े रहे हैं और वे अपनी सभी अवैध गतिविधि विदेश से आए चंदे से कर रहे थे।”

जब इस संबंध में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो से पूछा गया, तो उनका कहना था कि भारत में आने वाले विदेशी चंदे और उसकी प्रक्रिया, उसके होने वाले खर्च को पारदर्शी बनाने के लिए एफसीआरए कानून है। सरकार इस कानून में यदि संशोधन लेकर आ रही है, तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

कानूनगो कहते हैं, “जो भी लोग इसका विरोध कर रहे हैं, वे लोग भारत की डेमोग्राफी को बदल देना चाहते हैं, वे लोग भारत की संप्रभुता को विदेशी चंदे के माध्यम से नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। सरकार के इस प्रयास का सभी को प्रशंसा करनी चाहिए। मानव अधिकारों के संरक्षण के दृष्टिकोण से बहुत ही महत्वपूर्ण कदम है। पैसे की ताकत से धर्मांतरण करना, धर्मांतरण करवाना मानवों के मूल अधिकार का उल्लंघन है। हम सरकार के इस कदम का समर्थन करते हैं।”

उन्होंने कहा, “एफसीआरए कानून में पारदर्शिता आने के बाद हमें ये पता चला कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी का जो राजीव गांधी फाउंडेशन एनजीओ था, वो चाइना का पैसा भारत में लाकर इसका किस प्रकार से दुरुपयोग कर रहा था। 140 करोड़ के देश में अगर आप समाज सेवा का काम कर रहे हो तो आपकी विश्वसनीयता होनी चाहिए। भारत में दानदाताओं की कमी नहीं है। अगर देश के प्रति काम करोगे तो विदेशी चंदे पर डिपेंडेंसी नहीं रहेगी और अगर विदेशी चंदा चाहिए तो स्पष्ट रूप से बताओ कि क्या काम करोगे?”

इनके साथ ही वरिष्ठ अधिवक्ता आशुतोष कुमार झा का इसे लेकर साफ कहना है कि “अगर कोई संस्था पूरी पारदर्शिता के साथ काम कर रही है, तो उसे सख्त निगरानी से डर क्यों होना चाहिए? उच्चतम न्यायालय में भी सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि अनियंत्रित विदेशी फंडिंग राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए खतरा बन सकती है। आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। गृह मंत्रालय के अनुसार, वर्तमान में लगभग 15,000 संगठनों के पास वैध एफसीआरए पंजीकरण है। वहीं करीब 22,000 संगठनों का पंजीकरण रद्द किया जा चुका है और लगभग 15,000 का पंजीकरण नवीनीकरण न होने के कारण समाप्त हो गया। ये आंकड़े बताते हैं कि सरकार ने बड़े पैमाने पर कार्रवाई की है और यह किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है।”

एडवोकेट झा अपनी बातों में यह भी जोड़ते हैं कि “यह भी ध्यान देने योग्य है कि कानून के अनुसार विदेशी धन प्राप्त करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है। यह एक नियंत्रित सुविधा है, जोकि सरकार की अनुमति और निगरानी के तहत दी जाती है। संस्थाएं चाहें तो स्थानीय संसाधनों के माध्यम से भी अपने कार्य जारी रख सकती हैं। कुल मिलाकर विदेशी धन चाहिए जरूर लीजिए, लेकिन पारदर्शिता के साथ उसका उपयोग करें, फिलहाल मेरी से सरकार सिर्फ यही चाहती है।”

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी