लोकसंस्कृति की जीवित धरोहर पार्वतेव्वा होंगल को मानद डॉक्टरेट, 550 से अधिक लोकगीतों की संरक्षिका बनीं प्रेरणा
धारवाड़, 27 अप्रैल (हि.स.)। कर्नाटक के धारवाड़ जिले की मिट्टी से उभरीं लोकगायिका श्रीमती पार्वतेव्वा सिद्धप्पा होंगल आज लोकसंस्कृति और परंपरा की जीवित पहचान बन चुकी हैं। अपने स्वर में सदियों पुरानी लोक परंपराओं, ग्रामीण जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखने वाली पार्वतेव्वा होंगल को अब विजयपुर स्थित कर्नाटक राज्य अक्कमहादेवी महिला विश्वविद्यालय द्वारा मानद डॉक्टरेट (पीएचडी) से सम्मानित किया गया है।
बिना औपचारिक उच्च शिक्षा के केवल अपनी साधना, स्मरण शक्ति और लोकज्ञान के बल पर यह सम्मान प्राप्त करना उनके अद्वितीय योगदान का प्रमाण है। उनका गायन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से संचित ज्ञान, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों का जीवंत दस्तावेज है।
वर्ष 1956 में धारवाड़ के निकट देवरहुब्बल्ली गांव में जन्मी पार्वतेव्वा ने मात्र दूसरी कक्षा तक ही औपचारिक शिक्षा प्राप्त की। आर्थिक तंगी और कृषक परिवार की कठिन परिस्थितियों के बीच पली-बढ़ीं पार्वतेव्वा ने मजदूरी करते हुए अपने बच्चों को शिक्षित किया, लेकिन लोकगायन और संस्कृति सेवा का मार्ग कभी नहीं छोड़ा।
उनकी असाधारण स्मरण शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने मौखिक परंपरा के माध्यम से 550 से अधिक लोकगीत कंठस्थ किए हैं। इन गीतों में लगभग 35 हजार से अधिक लोक शब्दों का विशाल भंडार है, जो लोकसाहित्य और संस्कृति के शोधकर्ताओं के लिए अमूल्य धरोहर है। अब तक 40 से अधिक विद्यार्थियों ने अपने पीएचडी और एम.फिल. शोध कार्यों में उनके गीतों का उपयोग किया है।
उन्होंने 1980 के दशक में ऑल इंडिया रेडियो, बेंगलुरु केंद्र पर अपने लोकगीतों के माध्यम से श्रोताओं का दिल जीत लिया। इसके बाद उनकी पहचान गांवों से निकलकर राज्य और देशभर में फैल गई।
पिछले 50 वर्षों से लोकगायन ही उनका जीवन रहा है। विवाह, सीमंत, गौरी उत्सव, कोलाट और सोबाने जैसे पारंपरिक अवसरों पर उनके गीत ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। अब तक वे 600 से अधिक विवाह और 450 से अधिक सीमंत समारोहों में गायन कर लोकसंस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे चुकी हैं।
लहरी कैसेट कंपनी ने 1990 के दशक में उनके गीतों को रिकॉर्ड कर बाजार में उतारा। “गंगव्वा-गौरव्वा”, “वरनोडी कन्याकोडु” और “मल्लिगे गेलती” जैसे कैसेट अत्यंत लोकप्रिय हुए। मात्र चार वर्षों में इनकी एक लाख से अधिक प्रतियां बिकीं। आज उनके गीत सीडी और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी उपलब्ध हैं, जिससे नई पीढ़ी भी उनसे जुड़ रही है।
उनकी लोकधरोहर विदेशों तक पहुंची। वर्ष 1993 में नीदरलैंड की शोधकर्ता इंग्स माइकेल ने भारतीय गर्भवती महिलाओं के आहार पर अध्ययन के दौरान पार्वतेव्वा के गीतों को संकलित किया। फरवरी 2026 में उन्होंने दोबारा मुलाकात कर उनके लोकसंग्रह और सांस्कृतिक योगदान की सराहना की।
लोककला और संस्कृति संरक्षण में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। इनमें कर्नाटक लोक अकादमी सम्मान (1999), कर्नाटक राज्योत्सव पुरस्कार (2011) और मणिपाल लोकधरोहर पुरस्कार (2012) प्रमुख हैं।
आज जब युवा पीढ़ी कई बार दोअर्थी गीतों को ही लोकगीत समझने की भूल कर रही है, ऐसे समय में पार्वतेव्वा होंगल शुद्ध लोकपरंपरा को संरक्षित करने का कार्य कर रही हैं। वे आसपास के गांवों की युवतियों को पारंपरिक गीत सिखाकर लोकसंस्कृति की मूल आत्मा को जीवित रखे हुए हैं।
पार्वतेव्वा होंगल ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया है कि लोककला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की आत्मा और जीवन का पाठ है। सादगीपूर्ण ग्रामीण जीवन जीते हुए वे आज भी लोकसंस्कृति की ज्योति जलाए हुए हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं।---------------
हिन्दुस्थान समाचार / राकेश महादेवप्पा
