यमुनानगर : कपालमोचन मेला खो रहा पहचान, घटती आस्था और सुविधाओं का अभाव बना कारण
यमुनानगर, 18 मार्च (हि.स.)। यमुनानगर के कपालमोचन में चैत्र अमावस्या के अवसर पर आयोजित होने वाला पारंपरिक मेला अब अपनी पुरानी पहचान खोता नजर आ रहा है। कभी आस्था, परंपरा और लोक-संस्कृति का केंद्र रहा यह आयोजन धीरे-धीरे सीमित होता जा रहा है, जिससे क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत पर भी असर पड़ रहा है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कपालमोचन स्थित पवित्र सरोवर में स्नान और पितरों के निमित्त अनुष्ठान करने का विशेष महत्व माना जाता है। इसी विश्वास के चलते पहले हरियाणा के साथ-साथ आसपास के राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते थे। मेले के दौरान घाटों पर भारी भीड़ रहती थी और पूरा क्षेत्र धार्मिक गतिविधियों से जीवंत हो उठता था। यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक मेलजोल का भी प्रमुख माध्यम रहा है। मेले में पारंपरिक खेल, कुश्ती प्रतियोगिताएं, झूले और विभिन्न प्रकार की दुकानों से क्षेत्र में उत्सव जैसा माहौल बनता था। वर्तमान समय में परिस्थितियां बदलती नजर आ रही हैं। बदलती जीवनशैली और नई पीढ़ी की प्राथमिकताओं में आए परिवर्तन के कारण मेले की लोकप्रियता प्रभावित हुई है। इसके साथ ही आधारभूत सुविधाओं की कमी भी एक महत्वपूर्ण कारण बनकर सामने आई है। श्रद्धालुओं के लिए स्वच्छता, पेयजल, सुरक्षा और पार्किंग जैसी व्यवस्थाएं पर्याप्त न होने से लोगों की संख्या में गिरावट देखी गई है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह ऐतिहासिक आयोजन पूरी तरह सीमित हो सकता है।
जानकारों के अनुसार, बेहतर प्रबंधन, व्यापक प्रचार-प्रसार और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के समावेश से इस मेले को पुनः आकर्षक बनाया जा सकता है। जरूरत इस बात की है कि प्रशासन और समाज मिलकर इस परंपरा को सहेजने के प्रयास करें, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर से जुड़ सकें।
हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार
