केरल कुंभ शुरू : तिरुनावया में नीला नदी तट पर दिखा आध्यात्मिक ऊर्जा और धार्मिक उल्लास का संगम
मलप्पुरम, 19 जनवरी (हि.स.)। केरल राज्य के मलप्पुरम से बहने वाली भरतपुझा (नीला नदी) के शांत और पावन तट पर केरल कुंभ मेले का आधिकारिक शुभारंभ हो गया है। इस मेले के चलते तिरुनावया का ऐतिहासिक रेत का मैदान आध्यात्मिक ऊर्जा और धार्मिक उल्लास का संगम बन गया है। उत्तर भारत के कुंभ मेलों की प्राचीन परंपराओं से प्रेरित इस केरल मेले का औपचारिक उद्घाटन राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने पारंपरिक ध्वजारोहण कर किया।
नीला नदी के शांत और पावन तट पर केरल कुंभ मेला आज से 3 फरवरी, 2026 तक चलेगा और दक्षिण भारत के सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक आयोजनों में से एक माना जा रहा है। आयोजन के दौरान देशभर से हजारों श्रद्धालु, संत, संन्यासी और विद्वान तिरुनावया पहुंच रहे हैं। मेले के उद्घाटन समारोह में महामघा सभापति महामंडलेश्वर स्वामी आनंदवनम भारती, कार्यकारी अध्यक्ष के. दामोदरन और मुख्य समन्वयक के. केशवदास सहित कई प्रतिष्ठित हस्तियां मौजूद रहीं। क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करते हुए ज़मोरिन (सामूतिरी) परिवार के केसी दिलीप राजा अरिक्कारा और सुधीर नंबूथिरी की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष ऐतिहासिक और आध्यात्मिक गरिमा प्रदान की।
संतों और विद्वानों का दिव्य संगम
कुंभ मेले के शुभारंभ के साथ ही तिरुनावया का वातावरण अगरबत्ती की सुगंध और वैदिक मंत्रों के लयबद्ध उच्चारण से गुंजायमान हो गया। दक्षिण भारत के प्रमुख मठों से आए संन्यासी और आध्यात्मिक गुरु रविवार शाम से ही कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने लगे, जिससे आगामी पंद्रह दिनों तक चलने वाले भक्ति पर्व की भव्य रूपरेखा तैयार हो गई।
पवित्र अनुष्ठान और ‘नीला आरती’ का आकर्षण
केरल कुंभ मेला माघ गुप्त नवरात्रि के अवसर पर शुरू हुआ। भोर से श्रद्धालुओं ने नीला नदी के पवित्र जल में स्नान कर आत्मशुद्धि और पुण्य लाभ की कामना की। मान्यता है कि इस स्नान से आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है और मन तथा आत्मा शुद्ध होती है। इस आयोजन का सबसे बड़ा आकर्षण प्रतिदिन संध्या के समय होने वाली ‘नीला आरती’ है। सांस्कृतिक समन्वय के प्रतीक के रूप में इस आरती के संचालन के लिए काशी (वाराणसी) से पुजारी और विद्वान बुलाए गए हैं। विशाल पीतल के दीपकों, घंटियों की गूंज और मंत्रोच्चार के साथ होने वाली यह आरती विश्व प्रसिद्ध गंगा आरती की परंपरा पर आधारित है, जो श्रद्धालुओं के लिए अद्भुत और भावनात्मक अनुभव प्रस्तुत कर रही है।
उद्गम से संगम तक श्रीचक्रम रथ यात्रा
कुंभ मेले की भव्यता को और बढ़ाने के लिए श्रीचक्रम रथ यात्रा का आयोजन भी किया गया है। भरतपुझा नदी के तमिलनाडु स्थित तिरुमूर्ति पहाड़ियों से निकलने के सम्मान में यह रथ यात्रा नदी के उद्गम स्थल से शुरू हुई। भारतीय धर्म प्रचार सभा के आचार्य यतीशानंदननाथन के नेतृत्व में यह यात्रा कई कस्बों और गांवों से होकर गुजर रही है, जहां श्रद्धालुओं द्वारा इसका भव्य स्वागत किया जा रहा है। यह रथ यात्रा 22 जनवरी की शाम तिरुनावया पहुंचेगी।
सांस्कृतिक और सामाजिक संदेश
केरल कुंभ मेला केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान, सामाजिक समरसता और पर्यावरण चेतना का भी सशक्त मंच है। नवमुकुंद मंदिर परिसर और नीला नदी के तट को तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए विशेष रूप से सजाया और व्यवस्थित किया गया है। आयोजकों ने अन्नदानम (निःशुल्क भोजन), मेडिकल कैंप और विश्राम स्थलों की व्यापक व्यवस्था की गई है। आयोजकों के अनुसार, तिरुनावया का कुंभ मेला प्राचीन मामंकम परंपरा का पुनरुद्धार है। यह आयोजन विरासत संरक्षण, जल संरक्षण और सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश देता है। आगामी दिनों में नीला नदी के तट पर आध्यात्मिक प्रवचन, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और सेमिनार आयोजित किए जाएंगे, जिनका उद्देश्य सनातन धर्म के मूल्यों और केरल की नदियों की पारिस्थितिक पवित्रता के संरक्षण को बढ़ावा देना है।
संध्या समय नीला नदी पर ढलते सूर्य के साथ जगमगाते आरती के दीप, मंत्रोच्चार में लीन श्रद्धालु और शांत बहती नदी का दृश्य केरल की गहन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान को जीवंत रूप में प्रस्तुत कर रहा है। यह मेला श्रद्धालुओं और पर्यटकों दोनों के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव और शांति का संदेश लेकर आया है।-----------------------
हिन्दुस्थान समाचार / उदय कुमार सिंह
