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हर विध्वंस के बाद सागर की मिट्टी में खिलता स्वर्णकमल है सोमनाथ की अमर गाथा

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हर विध्वंस के बाद सागर की मिट्टी में खिलता स्वर्णकमल है सोमनाथ की अमर गाथा


हर विध्वंस के बाद सागर की मिट्टी में खिलता स्वर्णकमल है सोमनाथ की अमर गाथा


डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल, 07 जनवरी (हि.स.)। सागर की अथाह लहरें आज भी वही प्राचीन मंत्र गुनगुनाती प्रतीत होती हैं, हर हर महादेव! गुजरात के प्रभास पाटन तट पर, जहां नील सागर की छाती पर 'सोमनाथ' का स्वर्णकमल युगों-युगों से खिलता रहा है। यह संपूर्ण हिन्‍दू समाज के लिए एक मंदिर भर नहीं है, ये वो आस्‍था है जो करोड़ों हिन्‍दू के हृदय में वास करती है और यहां पत्थरों में अंकित हिंदू चेतना के रूप में विराजमान है। जब-जब इसे ध्वस्त किया गया, तब-तब यह और अधिक तेजस्वी होकर उठी है। हजारों वर्षों की इस विजयगाथा में सागर की मिट्टी साक्षी है जिसने हर विध्वंस के बाद नए स्वर्णकमल को जन्म दिया। सोमनाथ की कथा हिंदू हित की वह अमूल्य धरोहर है, जो हमें सिखाती है कि संताप में धैर्य, संघर्ष में श्रद्धा और विजय में विनम्रता सदैव ही बनाए रखना है।

सोमनाथ का प्रादुर्भाव द्वापर युग से जोड़ा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चंद्रवंशी राजा सोम ने चंद्रभागा नदी के तट पर भगवान शिव की आराधना कर इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना की। पुराणों में वर्णित बारह ज्योतिर्लिंगों में सोमनाथ को प्रथम स्थान प्राप्त है। कहा जाता है कि यहां भगवान शिव स्वयं ज्योति रूप में प्रकट हुए। वैदिक काल से यह तीर्थ भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और व्यापार का केंद्र रहता आया है। समुद्र की गोद में बसा यह मंदिर श्रद्धालुओं के साथ ही दूर-दूर से आने वाले व्यापारियों और राजाओं को भी आकर्षित करता रहा है लेकिन हिंदू हित की वास्तविक परीक्षा तब प्रारंभ हुई, जब इस पावन धाम पर इस्लामिक आक्रमणकारियों की दृष्टि पड़ी।

इतिहास कहता है कि 725 ईस्वी में अरब आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम का पहला प्रहार हुआ, परंतु सोमनाथ अडिग रहा। इसके बाद 1024 ईस्वी में महमूद गजनवी ने 50 हजार सैनिकों के साथ सोमनाथ पर आक्रमण किया। इतिहासकार फरिश्ता और अल-बिरूनी के विवरण बताते हैं कि मंदिर को लूटा गया, हजारों हिंदुओं का संहार हुआ और अपार धन लूटा गया। शिवलिंग को तोड़ने का प्रयास किया गया, लेकिन तब भी वह अखंड रहा। सागर की मिट्टी ने जैसे विद्रोह कर दिया। उस रक्तरंजित इतिहास को स्मरण कर आज भी हिंदू हृदय आक्रोश और वेदना से भर उठता है।

यह पहला अवसर नहीं था और न ही अंतिम। इतिहास साक्ष्‍य कहते हैं कि लगभग हजार वर्षों में सोमनाथ को सत्रह बार ध्वस्त किया गया। अलाउद्दीन खिलजी, मुबारक शाह, महमूद खलजी और औरंगजेब जैसे आक्रमणकारियों ने इसे बार-बार निशाना बनाया। विध्वंस की एक ही परिपाटी रही, मंदिर तोड़ो, आस्था को कुचलो। परंतु हर बार खंडहरों से एक ही स्वर उठा, ओम नमः शिवाय। सागर के तट की रेत का हर कण मानो शिवतत्व से गूंज उठता। चमत्कार स्वाभाविक था। हर विध्वंस के बाद सोमनाथ पुनः खड़ा हुआ, पहले से अधिक तेजस्वी स्‍वरूप में हिन्‍दू आस्‍था को विश्‍व भर ने बार-बार प्रकट होते देखा।

14वीं शताब्दी में चित्तौड़ के रावल ने इसका पुनर्निर्माण कराया। कहना होगा कि हिंदू राजाओं के लिए सोमनाथ एक मंदिर कभी नहीं रहा है, वह तो उनकी अस्मिता का प्रश्न है। सबसे मार्मिक अध्याय 1665 ईस्वी में आया, जब क्रूर औरंगजेब के आदेश पर मुगल सिपाहियों ने मंदिर को गिराकर मस्जिद में परिवर्तित कर दिया। हिंदू आस्था तब भी नहीं डरी। छिपकर पूजा होती रही, शिवतत्व सागर की मिट्टी में लुका-छिपी खेलता रहा। ऊपर की इमारतें भले ही गिरती रहीं, पर हृदयों का मंदिर अडिग रहा।

स्वर्णकमल का वास्तविक पुनरुत्थान आधुनिक भारत में हुआ। 1782 में गायकवाड़ शासक द्वारा आंशिक मरम्मत कराई गई, परंतु निर्णायक क्षण 1947 के बाद आया। स्वतंत्र भारत में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने संकल्प लिया कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण होगा। 11 मई 1951 को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भव्य मंदिर का लोकार्पण किया। बीस हजार श्रद्धालुओं की उपस्थिति में “हर हर महादेव” की गूंज ने इतिहास को नया मोड़ दिया। यह मंदिर हिंदू जागरण का स्तंभ बन गया। तत्कालीन विरोधों के बावजूद यह स्पष्ट संदेश था कि यह पत्थरों का नहीं, हिंदू हृदय का मंदिर है।

आज 130 फीट ऊंचा, पंचमंजिला सोमनाथ मंदिर समुद्र के किनारे स्वर्णकमल की भांति दमकता है। इसकी स्थापत्य शैली, नक्काशी और शिल्पकला प्राचीन भारतीय वास्तुकला की जीवंत मिसाल हैं। समुद्र की लहरें और मंदिर की भव्यता मिलकर एक दिव्य वातावरण रचती हैं, जहां श्रद्धालु आत्मिक शांति का अनुभव करता है। सोमनाथ की गाथा आज वर्तमान और भविष्य का मार्गदर्शन है। यह सिखाती है कि आक्रमण कितने भी हों, शिव की शक्ति अपार है। हिंदू धर्म की लचक और पुनर्निर्माण की क्षमता हर विध्वंस के बाद और प्रबल होकर अनेक स्‍थानों पर बार बार सामने आई है । अकेले सोमनाथ मंदिर पुनर्निमाण के लिए ही चालुक्य राजा भीमदेव प्रथम से लेकर राणा सांगा तक, असंख्य शासकों ने इसकी रक्षा और पुनर्निर्माण में योगदान दिया है।

आज जब हिंदू समाज विविध चुनौतियों से जूझ रहा है, तब सोमनाथ की सागर-स्नात मिट्टी हर हिंदू से कहती है, धैर्य रखो, संकल्प मत छोड़ो। स्वर्णकमल आज नहीं तो कल अवश्य खिलेगा। यह मंदिर कहना होगा आज मां भारती की गोद में शिव का निवास है। इसके कण-कण से एक ही उद्घोष गूंजता है, न डरना, न झुकना। हममें शिव है, शिवत्व है, हर हर महादेव।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी