विदेशी जमी पर मेजबान टीमों को हराकर ओलंपिक जीतने का नाम है मेजर ध्यानचंद : संजीव शुक्ला


—क्रिकेटर सर डॉन ब्रैडमैन की भांति हॉकी में ध्यानचंद का वैश्विक पटल पर है सम्मान
कानपुर, 29 अगस्त (हि.स.) भारत में आज यानी 29 अगस्त को हॉकी खिलाड़ी रहे मेजर ध्यानचंद के जन्मदिवस को राष्ट्रीय खेल दिवस के रुप में मनाया जा रहा है। इस दौरान हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले ध्यानचंद के संस्मरणों को लोग अपनी—अपनी तरह से याद कर रहे हैं। ऐसे में कानपुर निवासी व पूर्व राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी संजीव शुक्ला मेजर ध्यानचंद को याद करते हुए कहते हैं कि विदेशी जमीनों पर मेजबान टीमों को हराकर ओलंपिक जीतने का नाम है ध्यानचंद।
पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी व केन्द्रीय विद्यालय में खेल शिक्षक संजीव शुक्ला बताते हैं कि हॉकी उन दिनों मूलत: यूरोपियन खेल कहा जाता था। उस दौरान भारत को आजाद न होने के बावजूद अंग्रेजों ने भारतीय टीम को वैश्विक पटल पर खेलने के लिए प्रेरित किया। ऐसे में भारतीय टीम ने भी पीछे मुड़कर नहीं देखा और जादूगर कहे जाने वाले ध्यानचंद अर्न्तराष्ट्रीय मैचों में कमाल का खेल खेला। उन्होंने तीन ओलंपिक खेले और तीनों ही विदेशी जमीन पर हुए। पहले ओलंपिक यानी एम्सटर्डम (1928) में मेजबान टीम हालैंड को फाइनल में हराकर जादूगर की टीम ओलंपिक जीतने में सफल रही। इसके बाद अमेरिका के लास एंजिल्स में आयोजित 1932 के ओलंपिक के फाइनल में ध्यानचंद का दमदार प्रदर्शन रहा। भारतीय टीम 24—1 से अमेरिका को हरा दिया। इससे अमेरिकन मीडिया भी हतप्रद रह गई और भारतीय टीम को पूर्व से आया तूफान तक की संज्ञा दी गई।
कप्तान के तौर पर जीता बर्लिन, हिटलर का ठुकराया आफर
ध्यानचंद ने तीसरा ओलंपिक बतौर भारतीय हॉकी टीम के कप्तान के रुप में जीता। यह ओलंपिक जर्मनी के शहर बर्लिन में 1936 में आयोजित हुआ था। संजीव शुक्ला बताते हैं कि बर्लिन ओलंपिक को कोई भी हॉकी खिलाड़ी नहीं भुला सकता। यह ओलंपिक कई मायनों में यादगार है। पहला तो उस दौरान जर्मनी की हॉकी टीम वैश्विक पटल पर शिखर पर थी और उसी की जमी पर भारतीय टीम ने उसी टीम को फाइनल में हराकर ओलंपिक अपने नाम कर लिया था। दूसरा यह मैच 15 अगस्त के दिन खेला गया था और संयोग है कि आने वाले दिनों में 15 अगस्त को ही भारत भी अंग्रेजों से आजाद हुआ। तीसरा फाइनल मुकाबले से पहले ध्यानचंद की हॉकी को विधिवत चेक किया गया था कि कहीं ऐसा तो नहीं कि इसमें कुछ लगा हो जिससे इनकी हॉकी से गेंद चिपकी रहती हो। चौथा इस मैच में अपने देश की टीम को हौसला आफजाई करने खुद तानाशाह हिटलर आया था और हारने के बावजूद खेल भावना से हिटलर ध्यानचंद से इस कदर प्रभावित हुआ कि उसने ध्यानचंद को आफर दिया कि हमारी सेना में आ जाओ हम मेजर बना देंगे। इस पर खुद्दारी व देश के प्रति वफादारी करते हुए ध्यानचंद ने चंद सेकेंड में इस आफर को ठुकरा दिया था।
ब्रैडमैन की भांति ध्यानचंद का वैश्विक पटल पर है सम्मान
खेल शिक्षक बताते हैं कि उन दिनों क्रिकेट जगत में आस्ट्रेलिया के दिग्गज खिलाड़ी सर डॉन ब्रैडमैन का नाम वैश्विक पटल पर छाया था। लगातार तीन बार ओलंपिक जीतने के बाद ध्यानचंद का नाम हॉकी में उन्ही की भांति वैश्विक पटल पर सम्मान से लिया जाने लगा और हॉकी के जादूगर के नाम से मशहूर हो गये।
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हिन्दुस्थान समाचार / अजय सिंह