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हैरतअंगेज, अद्भुत और रोमांचकारी है जनजातीय सांस्कृतिक परंपरा का ‘गल उत्सव’

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हैरतअंगेज, अद्भुत और रोमांचकारी है जनजातीय सांस्कृतिक परंपरा का ‘गल उत्सव’


हैरतअंगेज, अद्भुत और रोमांचकारी है जनजातीय सांस्कृतिक परंपरा का ‘गल उत्सव’


डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा

झाबुआ, 04 मार्च (हि.स.)। पश्चिमी मध्यप्रदेश के जनजातीय बहुल जिले झाबुआ में मनाया जाने वाला 'गल-चूल उत्सव' आदिवासी समाज की आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक जीवंतता का अद्भुत उदाहरण है। यह अनोखा पर्व प्रतिवर्ष होलिका दहन के अगले दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को मनाया जाता है।

'गल-चूल उत्सव' केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि मन्नत पूरी होने पर उसे उतारने की अत्यंत रोमांचकारी और कठिन प्रक्रिया भी है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी आदिवासी समाज में उतनी ही श्रद्धा, भक्ति और विश्वास के साथ निभाई जा रही है।

दरअसल, यह उत्सव गल देवता के प्रति आस्था का प्रतीक है। जब किसी व्यक्ति की मनोकामना पूरी हो जाती है, तो वह गल देव के सामने अपनी मन्नत उतारने के लिए इस अनूठी प्रक्रिया में भाग लेता है। इस आयोजन में शामिल होने वाला व्यक्ति “लाडा” कहलाता है। वह अपनी श्रद्धा और विश्वास के साथ एक कठिन और रोमांचकारी अनुष्ठान पूरा करता है, जो देखने वालों के लिए भी आश्चर्य और रोमांच से भरा होता है।

होली के बाद शुरू होता है अनूठा पर्व

झाबुआ जिले में 'भगोरिया उत्सव' और होली परिक्रमा के बाद यह पारंपरिक पर्व मनाया जाता है। जिले के लगभग डेढ़ दर्जन स्थानों पर यह आयोजन होता है, जहां हजारों की संख्या में आदिवासी और अन्य समाज के लोग एकत्रित होते हैं। इस अवसर पर आसपास के गांवों और दूरस्थ क्षेत्रों से लोग बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। आयोजन स्थल पर आदिवासी समाज की महिलाएं और पुरुष अपने पारंपरिक वस्त्रों और गहनों से सुसज्जित होकर आते हैं, जिससे पूरा वातावरण उत्सवमय हो उठता है।

अत्यंत रोमांचकारी होती है गल घूमने की प्रक्रिया

गल उत्सव का सबसे महत्वपूर्ण और रोमांचकारी हिस्सा है गल घूमने की प्रक्रिया। इसमें मन्नतधारी व्यक्ति को लगभग 20 से 25 फीट ऊंचे मचान पर लकड़ी की एक लंबी बल्ली से मजबूती से बांधा जाता है। इस बल्ली के दूसरे सिरे पर एक मोटी रस्सी बंधी होती है, जिसे नीचे खड़े लोग पकड़कर गोल-गोल दौड़ते हुए घुमाते हैं। जैसे ही यह प्रक्रिया शुरू होती है, मन्नतधारी व्यक्ति हवा में गोलाकार घूमता हुआ दिखाई देता है। इस दौरान वह प्रार्थना की मुद्रा में रहता है और अपने देवता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। यह दृश्य अत्यंत रोमांचकारी होता है और देखने वालों के मन में आश्चर्य और श्रद्धा दोनों उत्पन्न करता है।

नृत्य, संगीत और उत्साह से भर उठता है वातावरण

'गल उत्सव' केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि सामूहिक आनंद और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का भी अवसर होता है। आयोजन स्थल पर गल देवता के मंदिर के चारों ओर पुरुष ढोल, मांदल और थाली जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाते हैं, जबकि महिलाएं मंगल गीत गाते हुए सामूहिक नृत्य करती हैं। जैसे-जैसे गल घूमने की प्रक्रिया शुरू होती है, उत्सव का उत्साह और भी बढ़ जाता है। ढोल और मांदल की गूंज तेज होने लगती है और नृत्य की गति भी बढ़ जाती है। मन्नतधारी के परिजन, मित्र और गांव के लोग उत्साहपूर्वक नृत्य करते हैं और पूरे वातावरण में उल्लास की लहर दौड़ जाती है।

मछलईमाता गांव में विशेष आयोजन

झाबुआ जिले के थांदला जनपद के मछलईमाता गांव में यह उत्सव विशेष रूप से प्रसिद्ध है। पहाड़ियों और छोटी-छोटी घाटियों से घिरे इस गांव में जब गल उत्सव का आयोजन होता है, तो दूर-दूर से लोग इसे देखने आते हैं। जब मन्नतधारी व्यक्ति पूजा-अर्चना कर मचान पर चढ़ता है और फिर हवा में घूमता है, तो यह दृश्य देखने वालों को रोमांच से भर देता है। गांव के बुजुर्गों के अनुसार, यहां सौ वर्षों से भी अधिक समय से यह परंपरा चली आ रही है और आज तक कोई दुर्घटना नहीं हुई है। ग्रामीण इसे देवी कालिका और मछलईमाता की कृपा मानते हैं।

सदियों पुरानी परंपरा

जिले में मछलईमाता, जरात और रायपुरिया के गल उत्सव सबसे पुराने और बड़े माने जाते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह परंपरा कितनी पुरानी है, इसका सटीक इतिहास तो ज्ञात नहीं, लेकिन बुजुर्ग बताते हैं कि वे बचपन से ही इस आयोजन को होते देख रहे हैं। एक वृद्ध महिला, जिनकी उम्र लगभग 105 वर्ष बताई जाती है, ने बताया कि उन्होंने बचपन से यह उत्सव देखा है। उनके अनुसार, जब उनके बच्चे छोटे थे, तब भी यह परंपरा उतनी ही धूमधाम से मनाई जाती थी। इससे स्पष्ट होता है कि यह लोक परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है।

चूल परंपरा भी है अनोखी

कुछ स्थानों पर गल उत्सव के साथ चूल का आयोजन भी किया जाता है। इसमें मन्नतधारी पुरुष और महिलाएं जलते अंगारों पर नंगे पैर चलते हैं। यह भी मन्नत पूरी होने पर किया जाने वाला अनुष्ठान है। इस प्रक्रिया को देखने वाले लोग इसे आस्था और विश्वास का अद्भुत उदाहरण मानते हैं।

पशु बलि की परंपरा और बदलता दृष्टिकोण

आदिवासी समाज में कहीं-कहीं आज भी पशु बलि की परंपरा देखने को मिलती है। हालांकि शिक्षा के प्रसार और सामाजिक जागरूकता के कारण अब कई लोग इस परंपरा से दूरी बनाने लगे हैं। विशेष रूप से कृष्ण प्रणामी भगत समाज के लोग शुचिता और संयम का जीवन अपनाते हैं। ये लोग भगवान श्रीकृष्ण को अपना आराध्य मानते हैं और मांस व मदिरा से दूर रहते हैं। इनके बीच पशु बलि निषिद्ध मानी जाती है। यही कारण है कि कई लोग ऐसे स्थानों पर जाकर अपनी मन्नत उतारते हैं जहां पशु बलि नहीं दी जाती।

मन्नतधारी के लिए सात दिन का संयम

गल घूमने वाले मन्नतधारी व्यक्ति को होली से लेकर चैत्र कृष्ण प्रतिपदा तक सात दिनों तक कड़े नियमों का पालन करना होता है। इस अवधि में उसके शरीर पर हल्दी का लेप लगाया जाता है और उसे अकेला नहीं छोड़ा जाता। परिजन या मित्र लगातार उसके साथ रहते हैं, ताकि किसी प्रकार की बाधा या नकारात्मक प्रभाव उस पर न पड़े। इस दौरान वह आसपास के हाट-बाजारों की परिक्रमा करता है, जिसे होली माता की परिक्रमा कहा जाता है।

आज भी जीवित है आस्था की परंपरा

समय के साथ आदिवासी समाज की भाषा, रहन-सहन और जीवन शैली में अनेक परिवर्तन आए हैं, लेकिन गल उत्सव आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। हर वर्ष यहां मेले जैसा माहौल बनता है, श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और मन्नत पूरी होने पर लोग इस अनोखी प्रक्रिया में भाग लेते हैं।

यह उत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जनजातीय संस्कृति की जीवंत पहचान है। यह दर्शाता है कि आधुनिकता के इस दौर में भी परंपराएं और आस्था अपनी गहरी जड़ों के कारण आज भी समाज के जीवन में मजबूती से विद्यमान हैं। इस प्रकार झाबुआ का गल उत्सव जनजातीय संस्कृति, विश्वास और सामूहिक जीवन की उस अद्भुत विरासत का प्रतीक है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आज भी उसी उत्साह और श्रद्धा के साथ आगे बढ़ रही है।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी