जलवायु परिवर्तन से कम हाे रहा सर्दी का समय, पहाड़ाें से बर्फ गायब हाेने से पर्यटन, कृषि व बागवानी प्रभावित
उत्तरकाशी, 21 जनवरी (हि.स.)। उत्तराखंड में इस वर्ष शीतकाल में बारिश व बर्फबारी न होने पर विशेषज्ञों और पर्यावरणविदाें ने चिंता
जताई है। पहाड़ों से बर्फ गायब है। इससे पर्यटन से लेकर कृषि पर भी प्रभाव पड़ रहा है। राज्य की आर्थिकी पर्यटन, कृषि, बागवानी और पशुपालन पर ही टिकी हैै। बारिश और बर्फबारी न हाेने से किसान भी चिंतित हैं।
हिमालय पर इस साल बर्फबारी और बारिश दोनों ही गायब है। पिछले साल का नवंबर और दिसम्बर का महीना बिना बारिश के ही गुजर गया। इस साल जनवरी का माह आधे से ज्यादा गुज़र चुका है, लेकिन बारिश और बर्फबारी का कुछ अता पता नहीं है। सर्दियों में जो पहाड़ बर्फ से ढके रहते थे, वहां के जंगलों में आग लग रही हैं। उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्र ओम, पर्वत आदि कैलाश केदारनाथ बदरीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, गौमुख , केदारकांठा, हरकिदून, जोशीमठ, बंदर, पुच, नैनीताल, अलमोड़ा और मुंशियारी में इस बार बर्फ पड़ी नहीं और न बारिश नहीं हुई।
इस संबंध में आईएमडी के महानिदेशक डॉक्टर मृत्युंजय मोहपात्रा ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण उष्ण कटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम को बदल रहा है। इस वजह से सिस्टम कमजोर हो रहे हैं और उनके रास्ते बदल रहे हैं। जिसकी वजह से उत्तर पश्चिमी भारत और हिमालय में सर्दियों में कम वर्षा हो रही है। वहीं सर्दियों में गर्मी और कम बर्फबारी से लंबे समय तक सूखा पड़ रहा है और धुंध भी बढ़ रही है।
भारत और दुनिया के ग्लेशियरों पर रिसर्च और स्टडी करने वाले वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के पूर्व वैज्ञानिक ग्लेशियोलॉजिस्ट डॉक्टर डीपी डोभाल का कहना है कि हिमालय खासकर उत्तराखंड और हिमाचल वाले क्षेत्र में कम बर्फबारी के कारण जलवायु परिवर्तन और मौसमी चक्र में बहुत तेजी से बदलाव आया है। डॉ डोभाल ने बताया कि हिमालय को थर्ड पाल कहा जाता है, क्योंकि यहाँ ग्लेशियर का भंडार है। आर्कटिक और अंटार्कटिका के बाद हिमालय में सबसे ज्यादा ग्लेशियर और स्नो कवर एरिया है। पूरे हिमालय की बात करें तो जिसमें नेपाल का क्षेत्र भी आता है, यहाँ लगभग 16 हजार से ज्यादा ग्लेशियर है। ग्लेशियर का कम या ज्यादा होना स्नो फॉल पर निर्भर करता है।
बर्फबारी और बारिश के न होने से इसका असर सीधे बागवानी और खेती पर पड़ रहा है। वहीं पर्यटक भी बर्फबारी का इंतजार करते रहे। नय साल में उत्तरकाशी के पर्यटन स्थलों पर सैलानी जरूर पहुंचे लेकिन बर्फबारी न होने से मायूस होकर वापस लौटे गए। मौसम के बदलते पैटर्न से पर्यटन के साथ कृषि व बागवानी पर भी दिख रहा है।
गौरतलब है कि उत्तराखंड की आर्थिक स्थिति पर्यटन, कृषि, बागवानी और पशुपालन पर टिकी हुई है। हर साल जनवरी में इन क्षेत्रों में भारी बर्फबारी होती थी, जिससे यहाँ पर्यटकों की भीड़ लगी रहती थी। इस बार सब सूना पड़ा हुआ है।
जलवायु परिवर्तन से बदल रहा मौसमी चक्र?
पिछले लंबे रिसर्च को देखते हुए पता चला है कि उत्तराखंड के हिमालय वाले क्षेत्र में बर्फबारी 12 या 5 साल में आए बदलाव के कारण नहीं है, बल्कि यह पिछले पंद्रह से 20 साल का एक ऐसा चक्र है। पिछले 5 साल के घटनाक्रम का सिलसिला है कि दिसम्बर, जनवरी में बर्फबारी कम देखने को मिल रही है, जबकि साल 2025 के फरवरी, मार्च और अप्रैल में अच्छी खासी बर्फ बारी हिमालयी क्षेत्रों में हुई थी। धीरे-धीरे जलवायु परिवर्तन की वजह से सर्दियों का मौसम सिकुड़ रहा है और गर्मियों का मौसम लंबा हो रहा है। वैज्ञानिक तौर पर जानें तो तापमान बढ़ रहा है, चाहे वह वायुमंडल का हो या फिर जमीन के ऊपर का। इस सर्दी के मौसम की तरह भारत में भी एक पैटर्न देखा गया है, जहाँ पश्चिमी विक्षोभ डब्लूडी कमजोर हो रहे हैं।
हिन्दुस्थान समाचार / चिरंजीव सेमवाल
