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औद्योगिक अपशिष्ट जल शोधन में बड़ी सफलता: आईआईटी बीएचयू और पारुल विश्वविद्यालय ने विकसित की हरित तकनीक

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औद्योगिक अपशिष्ट जल शोधन में बड़ी सफलता: आईआईटी बीएचयू और पारुल विश्वविद्यालय ने विकसित की हरित तकनीक


औद्योगिक अपशिष्ट जल शोधन में बड़ी सफलता: आईआईटी बीएचयू और पारुल विश्वविद्यालय ने विकसित की हरित तकनीक


वाराणसी, 26 मई (हि.स.)। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) और पारुल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने औद्योगिक अपशिष्ट जल में मौजूद अत्यंत विषैले एवं कैंसरकारी डाई मैलाकाइट ग्रीन को हटाने के लिए एक अत्याधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक विकसित की है। शोधकर्ताओं की यह उपलब्धि औद्योगिक जल प्रदूषण की गंभीर समस्या के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

यह संयुक्त शोध कार्य आईआईटी बीएचयू के स्कूल ऑफ बायोकेमिकल इंजीनियरिंग तथा पारुल विश्वविद्यालय के पारुल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग द्वारा किया गया। शोध दल का नेतृत्व आईआईटी बीएचयू के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विशाल मिश्रा ने किया। टीम में आलोक तिवारी, गौरांग डामले, डॉ. शिवेंदु सक्सेना, डॉ. विशाल सांधवार, दीक्षा सक्सेना तथा जेएसपीएम विश्वविद्यालय के डॉ. दीपक जाधव भी शामिल रहे। शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री के जर्नल में प्रकाशित हुए हैं।

शोधकर्ताओं द्वारा विकसित यह नवीन नैनोकॉम्पोजिट तकनीक पूरी तरह हरित एवं अपशिष्ट-आधारित है। इसमें संतरे के छिलकों के अर्क का उपयोग प्राकृतिक रिड्यूसिंग एजेंट के रूप में किया गया है। वैज्ञानिकों ने टिन ऑक्साइड नैनोकणों पर पॉलिएनिलीन और पॉलीपाइरोल की सह-पॉलीमरित परत को इन-सीटू पॉलिमराइजेशन तकनीक से विकसित किया है।

इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें संतरे के छिलके जैसे शून्य-लागत और नवीकरणीय अपशिष्ट पदार्थ का उपयोग किया गया है। विकसित प्रणाली मात्र 30 मिनट में 97.06 प्रतिशत तक मैलाकाइट ग्रीन डाई हटाने में सक्षम है। साथ ही इसकी एडसॉर्प्शन क्षमता 1250 एमजी/जी दर्ज की गई, जो इसे अत्यधिक प्रभावी बनाती है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, इस तकनीक में महंगे उपकरण, खतरनाक रसायन या विशेष प्रशिक्षित श्रमिकों की आवश्यकता नहीं होती। यह गैर-विषाक्त, जैव-संगत तथा औद्योगिक स्तर पर आसानी से उपयोग योग्य है।

उल्लेखनीय है कि विश्वभर में औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला डाई युक्त अपशिष्ट जल गंभीर पर्यावरणीय संकट बना हुआ है। मैलाकाइट ग्रीन एक ऐसा रसायन है, जो विषैला, कैंसरकारी तथा जैविक रूप से अपघटित न होने के कारण मानव स्वास्थ्य और जलीय जीवों के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है।

इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए आईआईटी बीएचयू के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने शोधकर्ताओं को बधाई दी। उन्होंने कहा कि इस प्रकार का सहयोगात्मक और अनुप्रयुक्त शोध सामाजिक एवं पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान हेतु संस्थान की सतत प्रौद्योगिकी विकास की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। शोधकर्ता डॉ. विशाल मिश्रा ने कहा कि यह अध्ययन विभिन्न संस्थानों के बीच मजबूत शैक्षणिक और अनुसंधान सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने बताया कि बायोकेमिकल इंजीनियरिंग और उन्नत पदार्थ विज्ञान के समन्वय से औद्योगिक अपशिष्ट जल शोधन के लिए व्यावहारिक और किफायती समाधान विकसित किया गया है।

शोध दल ने बताया कि भविष्य में इस तकनीक की पुनः उपयोग क्षमता तथा वास्तविक औद्योगिक अपशिष्ट जल प्रणालियों में इसके प्रदर्शन का परीक्षण किया जाएगा, ताकि इसे बड़े पैमाने पर उद्योगों में लागू किया जा सके।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी