वाराणसी : पूर्वोत्तर भारत की आनुवंशिक गुत्थी सुलझी, बीएचयू सहित दस संस्थानों के वैज्ञानिकों ने बैरियर थ्योरी को किया खारिज
—साझा शोध ने यह साबित कर दिया कि यह केवल इतिहास की जानकारी नहीं,बल्कि चिकित्सा विज्ञान के लिए भी अहम
वाराणसी, 20 मार्च (हि.स.)। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) सहित दस संस्थानों के वैज्ञानिकों ने भारत के इतिहास और मानव प्रवास को लेकर बड़ी आनुवंशिक गुत्थी सुलझाने में सफलता पाई है। साझा शोध ने यह साबित कर दिया है कि पूर्वोत्तर भारत, विशेष रूप से असम में प्राचीन काल में कोई बंद रास्ता या आनुवंशिक दीवार नहीं था। इसके विपरीत, यह दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच जीन प्रवाह का एक महत्वपूर्ण गलियारा था।
शोध में शामिल बीएचयू के जीन वैज्ञानिक प्रोफेसर डॉ. ज्ञानेश्वर चौबे ने इस पुरानी थ्योरी को खारिज करते हुए कहा कि पुराने शोध केवल 'मातृ' और 'पितृ' के सीमित नमूनों पर आधारित थे। हमने पहली बार 'हाई-रेजोल्यूशन ऑटोसोमल डीएनए' विश्लेषण का उपयोग किया है, जो मानव के पूरे जीनोम का अध्ययन करता है। हमारे परिणामों ने साबित कर दिया है कि यह क्षेत्र कभी भी अलग-थलग नहीं था। उन्होंने बताया कि यह शोध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित 'अमेरिकन जर्नल ऑफ ह्यूमन बायोलॉजी' के नवीनतम अंक में प्रकाशित हुआ है। पिछले दो दशकों से वैज्ञानिक जर्मनी के मैक्स प्लैंक संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तावित 'बैरियर हाइपोथेसिस' को मानते आ रहे थे, जिसमें कहा गया था कि पूर्वोत्तर भारत की भौगोलिक स्थिति ने एक दीवार की तरह कार्य किया। उन्होंने बताया कि मैक्स प्लैंक की 20 साल पुरानी थ्योरी ध्वस्त हो गई। पिछले दो दशकों से दुनिया भर के वैज्ञानिक जर्मनी के मैक्स प्लैंक संस्थान के वैज्ञानिकों ( (कॉर्डॉक्स और अन्य)) द्वारा 2004 में प्रस्तावित बैरियर हाइपोथेसिस (बाधा सिद्धांत) को ही सच मानते आ रहे थे।
उस थ्योरी में दावा किया गया था कि पूर्वोत्तर भारत की भौगोलिक स्थिति (पहाड़ और घने जंगल) ने एक दीवार की तरह काम किया, जिससे मुख्य भूमि भारत के लोगों का संपर्क पूर्वी एशिया के लोगों से नहीं हो पाया। उन्होंने बताया कि हमने पहली बार हाई-रेजोल्यूशन ऑटोसोमल डीएनए विश्लेषण का उपयोग किया है, जो मनुष्य के पूरे जीनोम का अध्ययन करता है। हमारे परिणामों ने साबित कर दिया है कि यह क्षेत्र कभी भी अलग-थलग नहीं था।
—असम के डीएनए में 76 फीसद भारतीय अंश
इस अध्ययन की सबसे चौंकाने वाली बात असम की इंडो-आर्यन (भारत-आर्य) आबादी का आनुवंशिक विश्लेषण है। इसमें मिश्रित विरासत, असम की आबादी में 76 प्रतिशत आनुवंशिक घटक, दक्षिण एशियाई (भारतीय) हैं, जबकि 24 प्रतिशत पूर्वी/दक्षिण-पूर्वी एशियाई हैं।
गंगा के मैदानों से सीधा संबंध: शोध में पाया गया कि असम के लोग अपने पड़ोसी तिब्बती-बर्मन समुदायों की तुलना में उत्तर भारत के गंगा के मैदानी इलाकों के समूहों, विशेष रूप से हरिजन और कोल समुदायों से अधिक समानता रखते हैं। आनुवंशिक भाषा में रन्स ऑफ होमोजाइगोसिटी का स्तर बहुत कम मिला है। इसका अर्थ है कि यहाँ की आबादी बहुत विविधतापूर्ण थी और कभी भी छोटे समूहों में सिमटी हुई नहीं रही।
——1800 साल पहले शुरू हुआ था महा-मिलन
वैज्ञानिकों ने आधुनिक तकनीकी उपकरणों के माध्यम से यह भी पता लगाया है कि यह विशाल आनुवंशिक मिश्रण कब हुआ था। प्रो. चौबे के अनुसार, यह प्रक्रिया लगभग 55 से 61 पीढ़ियों पहले शुरू हुई थी। समय के हिसाब से देखा जाए तो यह ईस्वी सन् 200 से 400 (लगभग 1650-1830 साल पहले) के आसपास का कालखंड है, जब विभिन्न हिस्सों से लोगों का प्रवास पूर्वोत्तर की ओर तेजी से हुआ था।
कलकत्ता विश्वविद्यालय के मानव विज्ञान विभाग के प्रोफेसर अरूप रतन बंद्योपाध्याय ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत को हमेशा से एक दुर्गम इलाका माना जाता रहा है, लेकिन हमारा शोध इसे एक मेल्टिंग पॉट (विविधताओं का संगम स्थल) के रूप में स्थापित करता है। यह एक ऐसा गलियारा रहा है जहाँ हजारों वर्षों से अलग-अलग भाषा बोलने वाले और अलग-अलग संस्कृतियों के लोग आपस में मिलते रहे हैं। यह केवल इतिहास की जानकारी नहीं है, बल्कि चिकित्सा विज्ञान के लिए भी अहम है। शोधकर्ताओं का कहना है कि पूर्वोत्तर भारत की इस अनूठी आनुवंशिक संरचना को समझकर भविष्य में क्षेत्र-विशिष्ट बीमारियों के उपचार और दवाओं के प्रभाव को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा।
——इस शोध टीम में शामिल प्रमुख संस्थान:
काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी (जन्तु विज्ञान विभाग, सेंटर फॉर जनेटिक डिसॉर्डर, रेडियोथेरपी), कलकत्ता विश्वविद्यालय, कोलकाता, सीडीएफडी हैदराबाद,एमिटी यूनिवर्सिटी, छत्तीसगढ़, मणिपाल यूनिवर्सिटी, जयपुर और डॉ लालजी सिंह रिसर्च सेंटर, जौनपुर साझा शोध में शामिल रहे।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी
