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अमेरिका के सहयोगियों ने युद्ध से दूरी बनाई, इटली, तुर्की और स्पेन का स्पष्ट रुख

ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष ने वैश्विक समीकरणों को बदल दिया है। अमेरिका के करीबी सहयोगी देशों जैसे इटली, तुर्की और स्पेन ने इस युद्ध से दूरी बना ली है। इटली ने अमेरिका को अपनी भूमि का उपयोग करने से मना किया है, जबकि तुर्की ने इसे 'इजराइल का युद्ध' करार दिया है। स्पेन ने अपने हवाई क्षेत्र को अमेरिका के लिए बंद कर दिया है। जानें इन देशों का क्या कहना है और अमेरिका अब किस स्थिति में है।
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अमेरिका के सहयोगियों ने युद्ध से दूरी बनाई, इटली, तुर्की और स्पेन का स्पष्ट रुख

दुनिया के समीकरणों में बदलाव

नई दिल्ली : ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष ने वैश्विक समीकरणों को बदल दिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिका के पुराने और करीबी सहयोगी देशों ने इस युद्ध से खुद को अलग कर लिया है। नाटो के सदस्य होने के बावजूद, इटली, तुर्की और स्पेन जैसे देशों ने न केवल युद्ध में भाग लेने से मना किया, बल्कि अमेरिका को अपनी भूमि और हवाई क्षेत्र के उपयोग पर भी रोक लगा दी है। इन देशों का मानना है कि सैन्य हस्तक्षेप से मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ेगा। आइए जानते हैं कि किन देशों ने अमेरिका का साथ छोड़ दिया है।


इटली का स्पष्ट संदेश

इटली ने अमेरिका को स्पष्ट रूप से बता दिया है कि वह उसकी अनुमति के बिना इतालवी भूमि का उपयोग नहीं कर सकता। हाल ही में, सिसिली के सिगोनेला एयर बेस पर एक अमेरिकी विमान को उतरने से रोका गया। इटली के रक्षा मंत्री गुड्डो क्रोसेटो ने कहा कि अमेरिका ने इसके लिए पहले से कोई अनुमति नहीं ली थी। इटली का मानना है कि संधि के नाम पर अमेरिका को अपनी मर्जी नहीं चलानी चाहिए, खासकर जब मामला किसी देश पर हमले का हो।


तुर्की की मध्यस्थता

नाटो का सदस्य होने के बावजूद, तुर्की इस युद्ध में अमेरिका के साथ नहीं है। राष्ट्रपति एर्दोगन ने इसे 'इजराइल का युद्ध' करार दिया है और कहा है कि इसकी कीमत निर्दोष मुसलमानों और मानवता को चुकानी पड़ रही है। तुर्की फिलहाल दोनों पक्षों के बीच संवाद स्थापित करने का कार्य कर रहा है। तुर्की के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि वे ईरान में किसी भी सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ हैं और शांति की कामना करते हैं।


स्पेन का हवाई क्षेत्र बंद

स्पेन की सरकार ने अमेरिका के लिए अपने हवाई क्षेत्र को पूरी तरह से बंद कर दिया है। प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने युद्ध की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि स्पेन के सैन्य ठिकानों का उपयोग ईरान पर हमले के लिए नहीं किया जा सकता। रक्षा मंत्री मार्गरीटा रोबल्स ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय युद्ध की शुरुआत में ही अमेरिका को सूचित कर दिया गया था। स्पेन का यह रुख दर्शाता है कि वह इस संघर्ष में शामिल नहीं होना चाहता।


ब्रिटेन का सीमित समर्थन

ब्रिटेन ने बहुत सावधानी से कदम उठाया है। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का कहना है कि वे इराक युद्ध जैसी ऐतिहासिक गलती नहीं दोहराना चाहते। हालांकि, ब्रिटेन ने अमेरिका को अपने ठिकानों के उपयोग की अनुमति दी है, लेकिन यह केवल 'डिफेंस' (बचाव) के लिए है, हमले के लिए नहीं। इसके बावजूद, ब्रिटेन के एयरबेस से अमेरिकी बमवर्षकों की उड़ान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।


फ्रांस और जर्मनी की शांति की अपील

यूरोप की इन दो प्रमुख शक्तियों ने भी युद्ध से दूरी बना ली है। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने कहा कि युद्ध समाप्त होने तक कोई भी सैन्य कदम उठाना गलत होगा। वहीं, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का कहना है कि वर्तमान में सबसे महत्वपूर्ण कार्य तनाव को कम करना है। इन देशों का मानना है कि यूरोप को इस संघर्ष में शामिल नहीं होना चाहिए और सभी का ध्यान अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन पर होना चाहिए।


खाड़ी देशों की दुविधा

सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देश एक कठिन स्थिति में हैं। वे सीधे तौर पर अमेरिका के सैन्य ऑपरेशन का हिस्सा नहीं बन रहे हैं, लेकिन उनके यहां पहले से मौजूद अमेरिकी ठिकानों को पूरी तरह से बंद भी नहीं कर पा रहे हैं। कतर और ओमान ने भी चेतावनी दी है कि इस युद्ध के परिणाम बहुत खतरनाक हो सकते हैं। ये देश चिंतित हैं कि यदि युद्ध फैला, तो सबसे अधिक नुकसान उन्हीं के क्षेत्र का होगा।


सहयोगी देशों का संयुक्त बयान

सात प्रमुख देशों (जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, नीदरलैंड, जापान और कनाडा) ने एक संयुक्त बयान जारी किया है। उन्होंने कहा कि वे समुद्र में जहाजों की सुरक्षा के लिए मदद कर सकते हैं, लेकिन ईरान के खिलाफ सीधे युद्ध में शामिल होने के लिए युद्ध का रुकना पहली शर्त है। यह दर्शाता है कि अमेरिका अब इस लड़ाई में काफी हद तक अकेला पड़ता जा रहा है और उसके सहयोगी भी संयम बरतने की सलाह दे रहे हैं।