ईरान-अमेरिका संघर्ष: ट्रंप का बड़ा कदम और होर्मुज जलडमरूमध्य का तनाव
ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध का बढ़ता तनाव
ईरान-अमेरिका संघर्ष: अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध ने 28 फरवरी से अब तक 15 दिन पूरे कर लिए हैं। इस दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। युद्ध की स्थिति ने पूरे मध्य पूर्व में तनाव बढ़ा दिया है, और दोनों पक्षों के बीच लगातार हवाई हमले जारी हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव ने अन्य देशों के लिए भी समस्याएं खड़ी कर दी हैं, क्योंकि यह मार्ग विश्व के अधिकांश तेल आपूर्ति का मुख्य स्रोत है। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका अन्य प्रभावित देशों के साथ मिलकर इस जलडमरूमध्य को सुरक्षित रखने के लिए युद्धपोत भेजेगा।
ट्रंप के अनुसार, ये देश एक 'टीम प्रयास' के तहत काम करेंगे ताकि इस समुद्री मार्ग को फिर से सुरक्षित किया जा सके। उन्होंने चेतावनी दी कि भले ही ईरान कमजोर हो गया हो, लेकिन वह अभी भी ड्रोन, नौसैनिक खदानों और मिसाइलों के माध्यम से जहाजों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर सकता है।
इस पर ईरान ने भी कड़ा जवाब दिया है। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के नेवी प्रमुख अलीरेजा तंगसिरी ने सोशल मीडिया पर कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह से बंद नहीं है, बल्कि केवल उनके नियंत्रण में है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका पहले ईरान की नौसेना को खत्म करने का झूठा दावा करता था, और अब वह अन्य देशों से मदद मांग रहा है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने स्पष्ट किया कि यह मार्ग केवल उनके दुश्मनों के जहाजों के लिए बंद है।
इस तनाव के बीच भारत के लिए एक सकारात्मक खबर आई है। भारत के दो एलपीजी टैंकर, शिवालिक और नंदा देवी, शनिवार सुबह सुरक्षित रूप से इस जलडमरूमध्य से गुजरे। मंत्रालय के विशेष सचिव राजेश कुमार सिन्हा ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच बातचीत के बाद भारत को यह विशेष अनुमति मिली है। इसी तरह, तुर्की के एक जहाज को भी इस मार्ग से गुजरने की अनुमति दी गई है, जबकि उसके 14 अन्य जहाज अभी अनुमति का इंतजार कर रहे हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'सोशल ट्रुथ' पर एक पोस्ट में कहा, "मेरे निर्देश पर अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने मध्य पूर्व के इतिहास में सबसे शक्तिशाली बमबारी हमलों में से एक को अंजाम दिया। ईरान के महत्वपूर्ण ठिकानों में से एक खार्ग द्वीप पर मौजूद सभी सैन्य ठिकानों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया।"
