ईरान का गोरिल्ला युद्ध: होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ता तनाव
नई दिल्ली में बढ़ते तनाव का असर
नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका-इज़राइल के बीच बढ़ते तनाव ने समुद्र में एक गंभीर मोड़ ले लिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो कि वैश्विक समुद्री मार्गों में सबसे महत्वपूर्ण है, में ईरान ने पारंपरिक नौसेना के बजाय 'गोरिल्ला युद्ध' की रणनीति अपनाई है।
ईरान की नई रणनीति
ईरान की 'हिट एंड रन' रणनीति
हालिया इंटेलिजेंस रिपोर्टों के अनुसार, ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने होर्मुज की खाड़ी में कई 'फास्ट अटैक क्राफ्ट्स' तैनात किए हैं। ये छोटी, तेज़ नावें आधुनिक मिसाइलों और टॉरपीडो से लैस हैं। ये नावें बड़े अमेरिकी युद्धपोतों के सामने सीधे नहीं आतीं, बल्कि छिपकर हमला करती हैं और तुरंत गायब हो जाती हैं। अमेरिका के लिए इन छोटी नावों का पता लगाना और उन्हें निशाना बनाना कठिन हो रहा है।
समुद्री माइंस और ड्रोन का खतरा
ईरान ने होर्मुज के संकरे रास्तों में हजारों समुद्री माइंस बिछा दी हैं, जिससे कमर्शियल तेल टैंकरों का मार्ग असुरक्षित हो गया है। इसके अलावा, 'शहाद' जैसे आत्मघाती ड्रोन उन जहाजों को निशाना बना रहे हैं जो अमेरिकी या इज़राइली गठबंधन से जुड़े माने जाते हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य से लगभग 20-30% कच्चा तेल गुजरता है।
शिपिंग कंपनियों पर असर
इस गोरिल्ला युद्ध के कारण कई प्रमुख शिपिंग कंपनियों ने इस मार्ग से अपने जहाज भेजना बंद कर दिया है। बीमा प्रीमियम में वृद्धि के कारण जहाजों का बीमा इतना महंगा हो गया है कि ढुलाई की लागत 300% तक बढ़ गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें $120 प्रति बैरल को पार कर सकती हैं, जिससे भारत सहित कई देशों में महंगाई का संकट उत्पन्न हो सकता है। अमेरिकी नौसेना ने अपने पांचवें बेड़े को हाई अलर्ट पर रखा है। ब्रिटेन ने भी अमेरिका को अपने बेस का उपयोग करने की अनुमति दी है ताकि ईरानी मिसाइल लॉन्च पैड्स को नष्ट किया जा सके। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान का गोरिल्ला युद्ध 'अदृश्य दुश्मन' से लड़ने जैसा है, जहाँ भारी हथियारों से लैस सेना भी असहाय महसूस कर रही है।
भारत पर संभावित प्रभाव
भारत पर प्रभाव
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से प्राप्त करता है। यदि यह गोरिल्ला युद्ध लंबा खिंचता है, तो भारत में पेट्रोल-डीजल की कमी और सप्लाई चेन में रुकावट आने की गंभीर संभावना है।
