ईरान को एनपीटी में उपाध्यक्ष पद मिलने से अमेरिका को बड़ा झटका
संयुक्त राष्ट्र में महत्वपूर्ण बैठक की शुरुआत
न्यूयॉर्क: संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) की एक महत्वपूर्ण बैठक शुरू हो गई है, जो एक महीने तक चलेगी। इस बैठक की शुरुआत में ही अमेरिका को एक बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है। बैठक में 34 देशों के प्रतिनिधियों को उपाध्यक्ष के रूप में चुना गया है, जिसमें ईरान ने भी अपनी जगह सुनिश्चित कर ली है। अमेरिका के कड़े विरोध और प्रयासों के बावजूद, ईरान को एनपीटी के भीतर उपाध्यक्ष का पद मिल गया है। इस बार अध्यक्ष की कुर्सी वियतनाम को मिली है, जो चीन और रूस के करीबी माना जाता है।
ईरान की जीत और अमेरिका की निराशा
121 देशों का समर्थन
समाचार स्रोतों के अनुसार, अमेरिका ने ईरान को इस पद से दूर रखने के लिए अंतिम समय तक प्रयास किए, लेकिन 121 देशों के समर्थन के कारण ईरान ने यह कुर्सी हासिल कर ली। ईरान का कहना है कि उसके नेता ने हमेशा से परमाणु हथियारों का विरोध किया है और अमेरिका जानबूझकर उनके खिलाफ झूठ फैलाने का काम कर रहा है।
अमेरिका की प्रतिक्रिया
‘अपमान’ करार दिया गया
परमाणु अप्रसार संधि के अध्यक्ष हेंग वियत के अनुसार, गुट निरपेक्ष देशों ने ईरान का समर्थन किया। हालांकि, यूएई और अमेरिका जैसे देशों ने इसका विरोध किया, लेकिन उनकी एक नहीं चली। अमेरिकी शस्त्र नियंत्रण और अप्रसार ब्यूरो के सहायक सचिव क्रिस्टोफर येव ने इसे एनपीटी के लिए एक बड़ा अपमान बताया है। उन्होंने कहा कि ईरान ने लंबे समय से परमाणु अप्रसार नीति की अवमानना की है, इसलिए उसे इस पद पर चुना जाना शर्मनाक है।
ईरान का पलटवार
अमेरिका पर आरोप
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के दूत रजा नजाफी ने अमेरिका की नीयत पर सवाल उठाते हुए कहा कि अमेरिका एकमात्र ऐसा देश है जिसने वास्तव में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका को इस मुद्दे पर बोलने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) का महत्व
संक्षिप्त जानकारी
परमाणु अप्रसार संधि का गठन 1970 में शीत युद्ध के दौरान परमाणु हमले के खतरे को देखते हुए किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य पूरी दुनिया को परमाणु तबाही से बचाना है। वर्तमान में 190 से अधिक देश इसके सदस्य हैं। इसके तीन प्रमुख उद्देश्य हैं: पहले, जिन देशों के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, वे भविष्य में इसे हासिल करने का प्रयास नहीं करेंगे; दूसरे, जिन देशों के पास परमाणु हथियार हैं, वे इसे कम करने की दिशा में काम करेंगे; और तीसरे, परमाणु ऊर्जा का उपयोग केवल शांतिपूर्ण कार्यों के लिए किया जाएगा।
