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उत्तराखंड का धर्मेश्वर महादेव मंदिर: कर्मों का हिसाब देने का स्थान

उत्तराखंड का धर्मेश्वर महादेव मंदिर एक अद्भुत स्थल है, जहाँ मृत्यु के बाद मनुष्यों को अपने कर्मों का हिसाब देना होता है। यहाँ यमराज की अदालत लगती है, और जीते-जी दर्शन करने से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। जानें इस मंदिर की विशेषताएँ, यहाँ की मान्यताएँ और ढाई पौड़ी का महत्व।
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उत्तराखंड का धर्मेश्वर महादेव मंदिर: कर्मों का हिसाब देने का स्थान

धर्मेश्वर महादेव मंदिर का महत्व

नई दिल्ली - यह माना जाता है कि मृत्यु के बाद हर व्यक्ति को अपने किए गए कर्मों का लेखा-जोखा देना होता है। जीवन में किए गए अच्छे और बुरे कार्यों के आधार पर ही अगला जन्म निर्धारित होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मृत्यु के बाद यह हिसाब-किताब कहाँ होता है?


उत्तराखंड में एक ऐसा मंदिर है, जहाँ मनुष्यों को अपने सभी कर्मों का हिसाब देना होता है। कहा जाता है कि यदि कोई व्यक्ति जीते-जी इस मंदिर के दर्शन कर ले, तो उसे अपने कर्मों के हिसाब से मुक्ति मिल जाती है। हम बात कर रहे हैं धर्मेश्वर महादेव की।


धर्मेश्वर महादेव मंदिर की विशेषताएँ

धर्मेश्वर महादेव मंदिर, उत्तराखंड के चौरासी मंदिर परिसर में स्थित एक अद्भुत स्थल है। यहाँ यमराज की अदालत लगती है, जहाँ मनुष्यों के कर्मों का हिसाब होता है। मंदिर के गर्भगृह में मटके के आकार का शिवलिंग स्थापित है, जिसे यमराज का रूप माना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति जीते-जी इस मंदिर में दर्शन नहीं करता, उसे मृत्यु के बाद यहाँ आकर भगवान धर्मेश्वर महादेव का सामना करना पड़ता है। भाई-दूज के अवसर पर यहाँ विशेष भीड़ होती है, जहाँ बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र की कामना करती हैं।


कर्मों का लेखा-जोखा

भगवान शिव, जो यमराज के रूप में विराजमान हैं, चित्रगुप्त की सहायता से मनुष्यों के कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं। मंदिर के पीछे चित्रगुप्त के लिए एक स्थान निर्धारित है। वहाँ एक काली शिला और पट्टी दिखाई देती है, जिस पर पत्थर से लकीरें बनाई गई हैं। यह लकीरें यह तय करती हैं कि व्यक्ति स्वर्ग जाएगा या नर्क।


ढाई पौड़ी का स्थान

मंदिर के निकट ढाई पौड़ी नामक स्थान है, जहाँ अकाल मृत्यु से मरे लोगों को अपना बाकी समय बिताना होता है। जो भी भक्त मंदिर में दर्शन के लिए आता है, उसे इन तीनों स्थानों का दर्शन करना आवश्यक माना जाता है। मंदिर के इतिहास के अनुसार, यहाँ महाराज कृष्ण गिरि ने साधना की थी और इसे पवित्र स्थल बनाया था।