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उस्ताद बड़े गुलाम अली खां: भारतीय शास्त्रीय संगीत के महानायक

उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक अद्वितीय नाम, ने अपनी विलक्षण आवाज और अद्भुत तानों से संगीत की दुनिया में अमिट छाप छोड़ी। उनका जन्म 1902 में हुआ और उन्होंने अपने जीवन में कई मंचों पर प्रदर्शन किया। महात्मा गांधी से लेकर आम श्रोताओं तक, उनकी लोकप्रियता अद्वितीय थी। जानिए उनके संगीत सफर, उनके योगदान और उनके जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों के बारे में।
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उस्ताद बड़े गुलाम अली खां: भारतीय शास्त्रीय संगीत के महानायक

उस्ताद बड़े गुलाम अली खां का संगीत सफर

नई दिल्ली: 'याद पिया की आए... आए ना बलम...' जैसे अमर गीतों को गाने वाले उस्ताद बड़े गुलाम अली खां भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक अद्वितीय नाम हैं, जिन्होंने श्रोताओं के दिलों में एक विशेष स्थान बनाया। वे पटियाला घराने के प्रमुख प्रतिनिधि थे और अपनी अनोखी आवाज, अद्भुत तानों और भावपूर्ण प्रस्तुतियों के लिए जाने जाते थे। 25 अप्रैल 1968 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनके गाने आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं।


बड़े गुलाम अली खां का जन्म 2 अप्रैल 1902 को पाकिस्तान के कसूर (पंजाब) में हुआ। उनका परिवार संगीत के क्षेत्र में गहराई से जुड़ा हुआ था। उनके पिता अली बख्श खां और चाचा काले खां प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे। बचपन से ही उन्हें संगीत की शिक्षा घर पर ही मिली, जिससे उनकी नींव मजबूत बनी।


उस्ताद ने अपना जीवन लाहौर, बम्बई, कोलकाता और हैदराबाद में बिताया। प्रसिद्ध गजल गायक गुलाम अली उनके शिष्य थे। बड़े गुलाम अली खां की संगीत यात्रा सारंगी वादक के रूप में शुरू हुई। उन्होंने अपने पिता और चाचा से संगीत के गुण सीखे। अली बख्श खां महाराजा कश्मीर के दरबारी गायक थे, और उनका घराना 'कश्मीरी घराना' कहलाता था। जब वे पटियाला में बस गए, तो यह घराना 'पटियाला घराना' के नाम से जाना जाने लगा।


1919 में लाहौर संगीत सम्मेलन में उन्होंने अपनी कला का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया, जिसके बाद कोलकाता और इलाहाबाद के संगीत सम्मेलनों ने उन्हें देशभर में प्रसिद्धि दिलाई। उनकी सुरीली आवाज और अभिनव शैली ने ठुमरी को एक नए अंदाज में प्रस्तुत किया, जिसमें लोक संगीत की मिठास थी।


बड़े गुलाम अली खां ने अपने खयाल गायन में ध्रुपद, ग्वालियर और जयपुर घराने की शैलियों का सुंदर मिश्रण किया। महात्मा गांधी ने एक बार उनके 'राधेश्याम बोल' भजन को सुनकर उनकी प्रशंसा की थी। उन्होंने फिल्म 'मुगल-ए-आजम' में तानसेन के किरदार के लिए अपनी आवाज दी।


हालांकि, बड़े गुलाम अली खां फिल्मों में गाने के खिलाफ थे। जब फिल्म निर्देशक के. आसिफ ने उनसे 'मुगल-ए-आजम' के लिए गाने का अनुरोध किया, तो उन्होंने 25,000 रुपये प्रति गाने की मांग की, जो उस समय की सबसे बड़ी रकम थी। इस शर्त को मानने के बाद उन्होंने फिल्म में 'प्रेम जोगन बन के' और 'शुभ दिन आयो' गाने गाए।


1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद वे कुछ समय के लिए पाकिस्तान गए, लेकिन बाद में भारत लौट आए और यहीं बस गए। उन्होंने भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया और अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक संगीत की सेवा की। उन्हें 1962 में पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लंबे समय तक बीमारी के बाद, उनका निधन 25 अप्रैल 1968 को हैदराबाद में हुआ।