एल नीनो के नए शोध से बढ़ी चिंताएं, भारत पर पड़ सकता है गंभीर असर
एल नीनो और समुद्र के खारेपन का संबंध
एल नीनो, जो कि मौसम के प्रमुख पैटर्न में से एक है, अब तक समुद्र के तापमान और हवाओं से जुड़ा हुआ माना जाता था। हाल ही में, ड्यूक यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक नई खोज की है, जिसमें इसे समुद्र के खारेपन से जोड़ा गया है। इस अध्ययन के अनुसार, यह नीनो की तीव्रता को 20 प्रतिशत तक बढ़ा सकता है।
भारत के संदर्भ में, यह खोज चिंताजनक है, क्योंकि यहां पहले से ही मानसून में अनियमितता देखी जा रही है। 2026 में संभावित एल नीनो की आशंका जताई जा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रशांत महासागर को एक समान जल के बजाय, बारिश, वाष्पीकरण और समुद्री धाराओं से बने नमकीन और कम नमकीन पानी के मिश्रण के रूप में देखना चाहिए।
विशेषज्ञों का दावा
ड्यूक यूनिवर्सिटी के निकोलस स्कूल ऑफ द एनवायरनमेंट में क्लाइमेट डायनामिक्स के सहायक प्रोफेसर शिनेंग हू और उनकी टीम ने यह महत्वपूर्ण खोज की है। उनके अनुसार, वसंत ऋतु (मार्च से मई) के दौरान पश्चिमी प्रशांत के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में ताजा पानी का जमाव और खारे पानी का दूर होना समुद्र की सतह पर पूर्व की ओर प्रवाह उत्पन्न करता है। यह प्रवाह एल नीनो को सक्रिय करता है और इसकी तीव्रता को बढ़ाता है। वैज्ञानिकों ने 65 वर्षों के वास्तविक समुद्री डेटा और कंप्यूटर जलवायु मॉडल का उपयोग करके इस सिद्धांत की पुष्टि की है।
एल नीनो का प्रभाव
एल नीनो को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि यह एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो हर 2 से 7 वर्षों में होती है। इस घटना के दौरान, पूर्वी प्रशांत महासागर में सतही पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है, जिससे वैश्विक वायु पैटर्न में बदलाव आते हैं। दक्षिण एशिया से नमी वाले बादल दूर चले जाते हैं, जिससे भारत में मानसून कमजोर पड़ता है। आंकड़ों के अनुसार, एल नीनो के वर्षों में भारत में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना होती है। मजबूत एल नीनो के दौरान सूखे की संभावना 60 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
