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कलकत्ता हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: ईद-उल-अजहा पर पशुओं की कुर्बानी पर रोक बरकरार

कलकत्ता हाई कोर्ट ने ईद-उल-अजहा के अवसर पर पशुओं की कुर्बानी पर पश्चिम बंगाल सरकार के प्रतिबंध को बनाए रखा है। अदालत ने धार्मिक आधार पर छूट देने की याचिकाओं को खारिज कर दिया, जबकि राज्य सरकार को विशेष राहत की आवश्यकता पर निर्णय लेने का निर्देश दिया। इस मुद्दे पर राजनीतिक और धार्मिक चर्चाएं बढ़ गई हैं, जिसमें कई नेता शामिल हैं। जानें इस फैसले के पीछे की वजहें और इसके संभावित प्रभाव।
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कलकत्ता हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: ईद-उल-अजहा पर पशुओं की कुर्बानी पर रोक बरकरार

पशुओं की कुर्बानी पर प्रतिबंध

नई दिल्ली - कलकत्ता हाई कोर्ट ने ईद-उल-अजहा के अवसर पर पशुओं की कुर्बानी पर पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को फिलहाल बनाए रखा है। अदालत ने धार्मिक आधार पर छूट देने और भैंस, बैल जैसे जानवरों की कुर्बानी की अनुमति मांगने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह 27 और 28 मई को ईद के मौके पर किसी विशेष राहत की आवश्यकता है या नहीं, इस पर 24 घंटे के भीतर निर्णय ले।


इस मुद्दे पर राज्य में राजनीतिक और धार्मिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। कई नेताओं, जिनमें महुआ मोइत्रा भी शामिल हैं, ने अदालत में याचिका दायर कर कहा कि नई पाबंदियां धार्मिक परंपराओं और ग्रामीण पशु व्यापार पर नकारात्मक प्रभाव डालेंगी।


राज्य सरकार के आदेश के अनुसार, केवल वे पशु कुर्बानी के लिए मान्य होंगे जिनकी उम्र 14 वर्ष से अधिक हो या जो स्थायी रूप से विकलांग हों। इसके अलावा, किसी भी पशु की कुर्बानी से पहले उसका वेटनरी परीक्षण और फिटनेस सर्टिफिकेट लेना अनिवार्य होगा। नए नियमों के तहत सांड, बैल, गाय, बछड़े और भैंस की कुर्बानी पर विशेष निगरानी रखी गई है।


इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सुजॉय पॉल और जस्टिस पार्थ सारथी सेन की डिवीजन बेंच ने की। सुनवाई के दौरान टीएमसी विधायक अखरुज़्ज़मान और महुआ मोइत्रा भी अदालत में उपस्थित रहे।


याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील शदान फरासात ने अदालत में दलील दी कि 1950 के कानून की शर्तें धार्मिक कुर्बानी की परंपराओं के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने कहा कि बकरीद पर स्वस्थ पशु की कुर्बानी दी जाती है, जबकि कानून के तहत केवल बूढ़े या विकलांग पशुओं को अनुमति मिलती है, जो धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है।