कानपुर में अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का खुलासा: 8वीं पास ड्राइवर ने बनाया अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क
कानपुर में किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का भंडाफोड़
कानपुर: उत्तर प्रदेश के कानपुर में चल रहे अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट की जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। यह मामला किसी थ्रिलर फिल्म की तरह ही है, जिसमें अब तक 60 से अधिक अवैध किडनी ट्रांसप्लांट की जानकारी मिली है, जिसमें विदेशी मरीजों का भी संबंध है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे अंतरराष्ट्रीय रैकेट का संचालन एक 8वीं पास एंबुलेंस ड्राइवर कर रहा था।
ऑपरेशन के दिन अस्पताल का स्टाफ गायब
इन अवैध ऑपरेशनों को इतनी चतुराई से अंजाम दिया जाता था कि पुलिस या स्वास्थ्य विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगती थी। जिस दिन किसी मरीज का किडनी ट्रांसप्लांट होता था, उस दिन अस्पताल के नियमित स्टाफ को छुट्टी पर भेज दिया जाता था। इसके बाद एक विशेष 'सर्जिकल टीम' वहां पहुंचती थी, जो केवल कुछ घंटों के लिए बुलाई जाती थी। ऑपरेशन के तुरंत बाद मरीजों को अलग-अलग ठिकानों पर भेज दिया जाता था ताकि कोई भी लिंक न जुड़ सके।
8वीं पास एंबुलेंस ड्राइवर ने पहना स्टेथोस्कोप
पुलिस को इस काले कारोबार की जानकारी पिछले साल मिली थी, लेकिन मुख्य कड़ी तक पहुंचने में काफी समय लगा। जब 'आरोही हॉस्पिटल' पर छापा मारा गया, तब इस सिंडिकेट का पर्दाफाश हुआ। जांच में 'आहूजा हॉस्पिटल' से भी ट्रांसप्लांट के सबूत मिले। एक विदेशी महिला के ट्रांसप्लांट के मामले ने इस रैकेट के अंतरराष्ट्रीय पहलू को उजागर किया। जब पुलिस ने मास्टरमाइंड शिवम अग्रवाल उर्फ 'काना' को गिरफ्तार किया, तो यह पता चला कि वह केवल 8वीं पास है और पहले एंबुलेंस चलाता था।
टेलीग्राम पर तय होती थी कीमत
इस गिरोह का संचालन पूरी तरह से हाईटेक था। मेरठ के डॉक्टर अफजाल ने 'टेलीग्राम' ऐप पर एक सीक्रेट ग्रुप बनाया था, जहां डोनर और रिसीवर के बीच सीधी डील होती थी। इसी ग्रुप के जरिए मेरठ की पारुल तोमर का सौदा बिहार के एमबीए छात्र आयुष चौधरी के साथ हुआ। पारुल ने अपनी जान बचाने के लिए करीब 80 लाख रुपये खर्च किए, लेकिन अस्पताल की लापरवाही ने उनकी जान को खतरे में डाल दिया।
संक्रमण ने बिगाड़ी हालत
ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को गंभीर संक्रमण से बचाने के लिए सख्त आइसोलेशन की आवश्यकता होती है, लेकिन इन अवैध अस्पतालों में बुनियादी सावधानियों की अनदेखी की गई। पारुल को भयंकर इन्फेक्शन हो गया, जिसके बाद उन्हें लखनऊ के पीजीआई में भर्ती कराया गया। डोनर आयुष की हालत स्थिर है, लेकिन उन्हें भी सही इलाज न मिलने पर खतरा बना हुआ है। कानपुर मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने स्वीकार किया है कि उनके पास किडनी ट्रांसप्लांट की अनुमति और आवश्यक दवाइयां नहीं हैं। इस पूरे मामले ने सिस्टम की खामियों को उजागर किया है।
