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किन्नर समुदाय की जबरन वसूली पर हाई कोर्ट का फैसला

लखनऊ हाई कोर्ट ने किन्नर समुदाय द्वारा नेग के नाम पर जबरन वसूली को गैरकानूनी ठहराया है। यह मामला उत्तर प्रदेश के गौंडा जिले की किन्नर रेखा देवी की याचिका पर आधारित था। अदालत ने इस प्रथा को भारतीय न्याय संहिता के तहत अपराध माना है। जानें किन्नर समुदाय की परंपरा, इतिहास और वर्तमान स्थिति के बारे में, जिसमें उनकी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता पर भी चर्चा की गई है।
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किन्नर समुदाय की जबरन वसूली पर हाई कोर्ट का फैसला

जबरन वसूली की प्रथा पर हाई कोर्ट का निर्णय

किन्नर समुदाय अक्सर अपने जजमानों से जबरन धन वसूलने के लिए कुख्यात है। कभी-कभी, यह वसूली का तरीका इतना अभद्र हो जाता है कि जजमान के परिवार के सामने निर्वस्त्र होना, भद्दी गालियाँ देना, और डराना धमकाना शामिल होता है। ऐसे में भयभीत जजमान अपनी आर्थिक स्थिति से कई गुना अधिक राशि देकर इस समस्या से छुटकारा पाने की कोशिश करते हैं।


लखनऊ हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

लखनऊ खंडपीठ ने एक किन्नर की याचिका पर नेग के नाम पर जबरन वसूली को गैरकानूनी ठहराया है। अदालत ने इसे भारतीय न्याय संहिता के तहत अपराध माना है। यह मामला उत्तर प्रदेश के गौंडा जिले की किन्नर रेखा देवी की याचिका पर आधारित था, जिसमें उन्होंने अपने जजमानी क्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट करने की मांग की थी। अदालत ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया।


किन्नर समुदाय की परंपरा

यह सच है कि किन्नर विशेष अवसरों पर जैसे जन्म, विवाह या गृह-प्रवेश पर बधाई देने आते हैं और नाच-गाकर नेग मांगते हैं। भारत में यह प्रथा हजारों वर्षों से चली आ रही है, जिसकी जड़ें पौराणिक काल में हैं।


रामायण की एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब भगवान राम 14 वर्षों के वनवास पर गए, तो किन्नर उनके लौटने की प्रतीक्षा करते रहे। राम ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया कि शुभ अवसरों पर उनका आशीर्वाद विशेष फलदायी होगा।


महाभारत और किन्नरों का उल्लेख

महाभारत में अर्जुन का बृहन्नला रूप और शिखंडी जैसे पात्र तीसरे लिंग की मान्यता को दर्शाते हैं। किन्नरों का उल्लेख लगभग 400 ईसा पूर्व लिखे गए कामसूत्र में भी मिलता है। वेदों और पुराणों में भी इनका जिक्र है।


इतिहास में किन्नरों की भूमिका

मुगल काल में हिजड़ों की भूमिका महत्वपूर्ण थी, जहाँ वे हरम की रखवाली और दरबारी सेवाओं में शामिल थे। बधाई की परंपरा इस समय अधिक प्रचलित हुई।


हालांकि, अंग्रेजों ने 1871 में 'क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट' के तहत किन्नरों को अपराधी घोषित कर दिया, जिससे उनकी पारंपरिक आजीविका प्रभावित हुई। आज़ादी के बाद यह कानून समाप्त कर दिया गया।


समाज में किन्नरों की स्थिति

हालांकि, किन्नर समुदाय की जबरन वसूली की प्रथा को समाप्त करने की आवश्यकता है। यह गुंडई और अवैध वसूली का एक तरीका है, जिस पर प्रशासन को सख्ती से कार्रवाई करनी चाहिए।


सामाजिक मान्यताओं के अनुसार, किन्नरों का शुभ अवसरों पर आना और आशीर्वाद देना शुभ माना जाता है। लेकिन, यह भी सच है कि सभी किन्नर संपन्न नहीं होते। उनकी आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा का उचित प्रबंध होना चाहिए।


सरकार और समाज की जिम्मेदारी

सरकार और समाज की जिम्मेदारी है कि किन्नरों को नाचने-गाने या भीख मांगने से हटाकर छोटे व्यवसायों या नौकरियों में लगाया जाए। इससे वे सम्मानजनक जीवन जी सकें।


स्थानीय पुलिस को जबरन वसूली करने वाले किन्नरों से परिवारों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। इस समस्या को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।