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क्या ईरान-इजराइल संघर्ष का अंत संभव है?

क्या ईरान-इजराइल संघर्ष का अंत निकट है? इस लेख में हम इस जटिल स्थिति के पीछे के कारणों और संभावित परिणामों पर चर्चा करेंगे। जानें कि कैसे नेतन्याहू और ट्रंप की नीतियाँ इस संघर्ष को प्रभावित कर रही हैं और क्या ईरान कभी समर्पण करेगा। क्या यह संघर्ष एक कैच-22 स्थिति में पहुँच गया है? जानने के लिए पढ़ें पूरा लेख।
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क्या ईरान-इजराइल संघर्ष का अंत संभव है?

संघर्ष की जटिलताएँ

क्या यूक्रेन-रूस युद्ध से भी अधिक लंबा संघर्ष संभव है? यह इसलिए है क्योंकि रूस-यूक्रेन की लड़ाई एक जमीनी संघर्ष है, जिसमें दोनों सेनाएँ आमने-सामने हैं। वहीं, खाड़ी में धर्म, सभ्यता और इतिहास के बीच एक जटिल स्थिति उत्पन्न हो रही है। इस लड़ाई का उद्देश्य स्पष्ट नहीं है, और न ही इससे किसी भी पक्ष को स्थायी लाभ मिलने की संभावना है। न तो ट्रंप ईरान को समाप्त कर सकते हैं और न ही ईरान का शासन इजराइल को मिटा सकता है।


इसका मतलब यह है कि लड़ाई का उद्देश्य भी अस्थायी है, और इसके साधन जैसे ड्रोन, विमान और मिसाइल भी अस्थायी हैं। जीत या हार का निर्धारण भी केवल प्रचार पर निर्भर करता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस संघर्ष का सूत्रधार कौन है? मेरा स्पष्ट उत्तर है- नेतन्याहू। उनके पास एक लंबा ट्रैक रिकॉर्ड है, जिसमें उनके ऑपरेशन कभी समाप्त नहीं होते। इजराइल एक छोटी सी गाजा पट्टी को सुरक्षित बनाने के लिए वर्षों से संघर्ष कर रहा है।


2023 में हमास के हमलों के तीन साल बाद, क्या इजराइली सेना अब भी फंसी हुई नहीं है? नेतन्याहू अपने स्वभाव के अनुसार कभी थकते नहीं हैं। जब भी मौका मिलता है, वे तुरंत कार्रवाई करते हैं। उन्होंने तेहरान की लीडरशीप को खत्म करने की जानकारी ट्रंप को दी, जिससे ईरान पर हमला हुआ।


हालांकि, इस संघर्ष में कोई भी पक्ष वास्तव में हताहत नहीं होता। ट्रंप ने हाल ही में कहा कि ईरान के छापामारों और ड्रोन के खिलाफ अमेरिका क्या कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान ने अमेरिका के सहयोगी देशों पर बिना किसी कारण हमला किया।


नेतन्याहू ने अमेरिका को बेवकूफ बनाया है। अमेरिका में ईसाई समुदाय की एक बड़ी संख्या मानती है कि यहूदियों का इजराइल में लौटना ईश्वर की योजना का हिस्सा है। इस प्रकार, 21वीं सदी में युद्धों का एक नया स्वरूप उभरा है।


पिछली सदी की लड़ाइयों की तुलना में, आज की लड़ाइयाँ अधिक हवाई और तकनीकी हैं। इजराइल और अरब देशों के बीच चार युद्धों में वास्तविक शक्ति परीक्षण हुआ था। लेकिन अब, लड़ाई का स्वरूप बदल गया है।


ईरान के खुमैनी ने 1979 में अयातुल्लाहशाही की नींव रखी थी, और तब से ईरान ने इजराइल को मिटाने का प्रण लिया। ईरान ने हमेशा से अमेरिका और इजराइल के खिलाफ अपनी स्थिति को मजबूत किया है।


इसलिए, नेतन्याहू और ट्रंप ईरान को कितना भी नुकसान पहुँचाएँ, ईरान कभी भी समर्पण नहीं करेगा। ईरान की विशाल जनसंख्या और सेना के बावजूद, वे खाड़ी में अपनी स्थिति बनाए रखेंगे।


इसका मतलब यह है कि पश्चिम एशिया में ट्रंप और अमेरिका अब एक बोझ बन गए हैं। ट्रंप अब अपनी पार्टी के लिए भी एक समस्या बनते जा रहे हैं।


इस प्रकार, यह संघर्ष एक कैच-22 स्थिति में पहुँच गया है, जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं है। ट्रंप और अमेरिका अकेले पड़ गए हैं, और यह स्थिति चीन के लिए फायदेमंद है।