क्या मध्य प्रदेश का बजट किसानों की उम्मीदों पर खरा उतरेगा?
मध्य प्रदेश: केंद्रीय बजट की तैयारी में किसान
मध्य प्रदेश : केंद्रीय बजट के आगमन के साथ, मध्य प्रदेश एक बार फिर से राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। इस राज्य ने गेहूं और दालों के सबसे बड़े उत्पादक के रूप में अपनी पहचान बनाई है, और इस बार किसानों की उम्मीदें भी अधिक हैं। इसका कारण केवल कृषि क्षेत्र की ताकत नहीं, बल्कि केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का इस क्षेत्र से होना भी है। ऐसे में किसानों को विश्वास है कि इस बार बजट में उनकी समस्याओं को गंभीरता से लिया जाएगा। सीहोर के खेतों में लहलहाती फसलों के बीच एक सवाल बार-बार उठ रहा है: क्या यह बजट केवल घोषणाएं देगा या वास्तव में किसानों की जिंदगी में सुधार लाएगा?
कृषि का महत्वपूर्ण केंद्र
कृषि का मजबूत स्तंभ है मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश अब केवल अनाज उत्पादन का राज्य नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की कृषि अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार बन चुका है। यहाँ सबसे अधिक गेहूं का उत्पादन होता है। चना, मसूर, सोयाबीन और तिलहन के उत्पादन में भी यह राज्य अग्रणी है और कई मामलों में पंजाब और हरियाणा जैसे पारंपरिक कृषि राज्यों को पीछे छोड़ चुका है।
मसालों में भी प्रमुखता
मसालों के बाजार में भी मजबूत मौजूदगी
औषधीय फसलों के क्षेत्र में भी मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी महत्वपूर्ण है। अश्वगंधा, सफेद मुसली, गिलोय, तुलसी और कोलियस जैसी औषधीय फसलों का उत्पादन यहाँ लगभग आधा है। इसके अलावा, लहसुन, हल्दी, धनिया, मिर्च, जीरा और सौंफ के साथ-साथ टमाटर के उत्पादन में भी राज्य की प्रमुखता है। यही विविधता इसे किसी भी राष्ट्रीय कृषि नीति में अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है।
किसानों की उम्मीदें और MSP की मांग
किसानों की बढ़ती उम्मीदें और MSP की मांग
कृषि मंत्री का गृह राज्य होने के नाते, किसानों को उम्मीद है कि 1 फरवरी को पेश होने वाला बजट उनकी वास्तविक समस्याओं को संबोधित करेगा। उनकी प्राथमिक मांगें स्पष्ट हैं: फसलों का लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य, समय पर फसल बीमा भुगतान और बाजार के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा देने वाली मजबूत व्यवस्था। किसानों का कहना है कि लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ पाई है। यही असंतुलन उनके संकट का मुख्य कारण है।
सीहोर: उपजाऊ जमीन, लेकिन सीमित आमदनी
सीहोर: उपजाऊ जमीन, लेकिन सीमित आमदनी
सीहोर जिला इस विरोधाभास का स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। यहाँ की काली मिट्टी खरीफ और रबी दोनों मौसमों में खेती के लिए उपयुक्त है। जिले का बड़ा हिस्सा सिंचित है और सोयाबीन, चना, प्याज और लहसुन यहाँ की प्रमुख फसलें हैं। सीहोर का शरबती गेहूं अपनी गुणवत्ता, रंग और स्वाद के लिए जाना जाता है। फिर भी, किसानों का कहना है कि इतनी उपजाऊ जमीन और मेहनत के बावजूद उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं हो पाती।
किसानों की पीड़ा
खेतों से उठती आम किसान की पीड़ा
उलझवान गांव में 50 वर्षीय रूप सिंह अपनी तीन एकड़ जमीन पर खेती कर अपने परिवार का पालन करते हैं। उनके लिए खेती ही सब कुछ है, लेकिन इस साल प्याज की फसल उचित दाम न मिलने के कारण खेत में ही खराब हो गई। उनका कहना है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, जैसे बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी। ऐसे में यदि गेहूं और सोयाबीन के दाम नहीं बढ़ते, तो किसान कैसे टिकेगा? उनके भाई देव सिंह भी इसी चिंता को साझा करते हैं। उनका मानना है कि मौसम की मार, मुआवज़े की देरी और बाजार में सही कीमत न मिलना खेती को जोखिम भरा बना रहा है।
सामूहिक आवाज
गांवों में गूंजती सामूहिक आवाज
जैसे-जैसे दिन चढ़ता है, खेतों की मेड़ों पर किसान इकट्ठा होने लगते हैं। कोई किसान क्रेडिट कार्ड की सीमा बढ़ाने की बात करता है, तो कोई भंडारण की सुविधा की कमी की ओर इशारा करता है। किसानों का कहना है कि ये मांगें किसी अतिरिक्त सुविधा की नहीं, बल्कि खेती को ज़िंदा रखने की बुनियादी ज़रूरतें हैं। छोटे किसान विशेष रूप से खुद को सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
महिलाओं और छोटे किसानों की स्थिति
महिलाओं और छोटे किसानों की जमीनी सच्चाई
चंदेरी क्षेत्र में जमुनाबाई मेथी की फसल काटते हुए हिसाब लगाती हैं। बीज, खाद और दवाइयों का खर्च निकालने के बाद उनके हाथ में बहुत कम बचता है। वहीं पिपलिया मीरा गांव में संतोष मेवाड़ा बताते हैं कि प्याज की फसल उन्हें लागत से भी कम दाम पर बेचनी पड़ी। जब बाजार में कीमत बढ़ी, तब उनके पास बेचने के लिए कुछ नहीं बचा था।
बिचौलियों का प्रभाव
बिचौलियों और कर्ज का दुष्चक्र
कई किसानों का मानना है कि फसल का असली फायदा किसान को नहीं, बल्कि बिचौलियों को मिलता है। कीमतें तब बढ़ती हैं जब फसल किसान के हाथ से निकल चुकी होती है। कुछ किसान कर्ज़ माफी और निर्यात नीति में सुधार की मांग कर रहे हैं, ताकि उन्हें बेहतर बाजार मिल सके और नुकसान की भरपाई हो सके।
बड़े किसानों की चेतावनी
बड़े किसान की चेतावनी और बजट से अपेक्षा
सीहोर के बड़े किसान एमएस मेवाड़ा का मानना है कि यदि बजट में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति और गंभीर हो जाएगी। उनका कहना है कि एमएसपी को वास्तविक लागत के अनुरूप तय करना होगा, साथ ही कृषि यंत्रों पर सब्सिडी, बीमा सुधार और किसानों के बच्चों के लिए रोजगार के अवसर भी जरूरी हैं।
राज्य सरकार की योजनाएं
राज्य सरकार की योजनाएं और किसानों की चिंता
मध्य प्रदेश सरकार ने 2026 को किसान कल्याण वर्ष घोषित किया है। सिंचाई, सौर पंप, बीज परीक्षण, मंडी सुधार और भावांतर योजना के विस्तार जैसे कई वादे किए गए हैं। हालांकि किसानों को डर है कि ये योजनाएं कागज़ों तक ही सीमित न रह जाएं। उनका कहना है कि असली परीक्षा तब होगी जब ये योजनाएं खेत तक पहुंचेंगी।
बजट की उम्मीदें
बजट से उम्मीद या एक और इंतजार?
सीहोर और आसपास के क्षेत्रों में किसान बजट को केवल एक घोषणा पत्र के रूप में नहीं देख रहे हैं। वे इसे अपने नुकसान, अपने कर्ज़ और अपनी सड़ती फसलों के संदर्भ में परखेंगे। उनके लिए सवाल स्पष्ट है: क्या यह बजट खेतों तक पहुंचेगा या फिर उम्मीदें एक बार फिर अधूरी रह जाएंगी?
