गुजरात हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: एक थप्पड़ को 'क्रूरता' नहीं माना गया
गुजरात हाईकोर्ट का फैसला
अहमदाबाद: हाल ही में गुजरात हाईकोर्ट द्वारा दिया गया एक निर्णय देशभर में चर्चा का विषय बन गया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पति द्वारा पत्नी को मारा गया एक थप्पड़ 'क्रूरता' की श्रेणी में नहीं आता। इसके साथ ही, कोर्ट ने यह भी बताया कि क्रूरता साबित करने के लिए लगातार और असहनीय प्रताड़ना के ठोस सबूत होना आवश्यक है। इस फैसले पर जनता और कानूनी विशेषज्ञों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आई हैं।
तीन दशक पुराना मामला
यह मामला 1996 का है, जिस पर अब हाईकोर्ट ने निर्णय सुनाया है। दिलीपभाई मंगलाभाई वरली नामक व्यक्ति ने एक अपील दायर की थी, जिसमें उन्होंने सेशंस कोर्ट के 2003 के फैसले को चुनौती दी थी। उस समय निचली अदालत ने दिलीपभाई को अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत सात साल की सजा सुनाई थी। अब हाईकोर्ट ने इस सजा को रद्द कर दिया है।
पति की आय बढ़ाने की कोशिश
महिला पक्ष ने आरोप लगाया था कि पति हर दिन उसे मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान करता था, जिससे तंग आकर उसने आत्महत्या कर ली। हालांकि, सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि पति अपनी आय बढ़ाने के लिए रात में बैंजो बजाने जाता था, जो पत्नी को पसंद नहीं था। यही बात उनके बीच झगड़ों का कारण बनी। जस्टिस गीता गोपी ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने और क्रूरता को साबित करने के लिए केवल आरोप पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि लगातार होने वाली असहनीय मारपीट के पक्के सबूत होना अनिवार्य है।
एक थप्पड़ की घटना
इस मामले में एक थप्पड़ की घटना महत्वपूर्ण रही। अपीलकर्ता ने अदालत को बताया कि एक बार उसकी पत्नी बिना बताए मायके चली गई थी, जिससे पति और परिवार परेशान हो गए थे। इसी नाराजगी में पति ने पत्नी को एक थप्पड़ मारा। अदालत ने इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए कहा कि गुस्से में उठाए गए इस कदम को क्रूरता नहीं माना जा सकता और इसके आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने का दोष सिद्ध नहीं होता।
