गेहूं की फसल में जड़ माहों रोग: पहचान और उपचार
गेहूं की खेती का महत्व और रोगों का खतरा
रबी सीजन में गेहूं की खेती किसानों की आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। हालांकि, समय पर बुवाई, सिंचाई और खाद देने के बावजूद, प्रारंभिक चरण में लगने वाले कीट और रोग फसल को गंभीर खतरे में डाल सकते हैं। इनमें से एक गंभीर समस्या जड़ माहों रोग है, जो बुवाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद प्रकट होता है और यदि समय पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह उत्पादन में भारी कमी ला सकता है।
जड़ माहों रोग की पहचान और फैलने का तरीका
जड़ माहों रोग एक कीट जनित समस्या है, जिसमें छोटे कीट गेहूं की जड़ों से चिपककर पौधे का रस चूसते हैं। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, ये कीट मिट्टी में छिपे रहते हैं, जिससे उनकी प्रारंभिक पहचान मुश्किल होती है। जैसे-जैसे पौधे की जड़ कमजोर होती है, उसकी वृद्धि रुक जाती है।
गेहूं की फसल पर जड़ माहों रोग का प्रभाव
जब जड़ों से रस निकलता है, तो पौधा पोषक तत्व नहीं ले पाता, जिससे जड़ें कमजोर होकर गलने लगती हैं। इससे पौधा आसानी से उखड़ जाता है और प्रभावित क्षेत्र में पैदावार में तेजी से कमी आती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संक्रमण फैल जाए, तो खेत के बड़े हिस्से में 15 से 30 प्रतिशत तक उत्पादन हानि हो सकती है।
जड़ माहों रोग के शुरुआती संकेत
खेत में पौधों का पीला या सफेद होना, कुछ दिनों बाद पौधों का सूख जाना, और जड़ का कमजोर या सड़ा हुआ दिखना जड़ माहों रोग के संकेत हैं। जड़ों पर हरे रंग के जूं जैसे सूक्ष्म कीट भी दिखाई देते हैं, जिन्हें माहों कहा जाता है।
खतरे का समय और दीमक से अंतर
कृषि अनुसंधान केंद्रों के अनुसार, जड़ माहों रोग आमतौर पर बुवाई के 20 से 30 दिन के बीच सक्रिय होता है। इस समय दीमक की समस्या भी देखने को मिलती है, जिससे किसान भ्रमित हो जाते हैं। दोनों कीट जड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन अच्छी बात यह है कि इनका नियंत्रण करने के लिए समान दवाएं होती हैं।
जड़ माहों रोग का उपचार
यदि ऊपर बताए गए लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत उपचार आवश्यक है। विशेषज्ञों की सलाह है कि क्लोरोपायरीफॉस नामक दवा का 1 लीटर प्रति एकड़ की मात्रा में उपयोग किया जाए। इसे सिंचाई के पानी के साथ मिलाकर खेत में डालना चाहिए, जिससे दवा सीधे जड़ों तक पहुंचती है।
समय पर नियंत्रण का महत्व
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि प्रारंभिक अवस्था में उपचार करने से फसल सुरक्षित रहती है और दोबारा संक्रमण की संभावना कम होती है। इससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों बनी रहती हैं। थोड़ी सी जागरूकता किसान की मेहनत को बचा सकती है।
