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चीन में SCO समिट: मोदी की यात्रा और अमेरिका की चिंताएँ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान के दौरे के बाद चीन में SCO समिट में भाग लिया। इस समिट में मोदी की मुलाकात राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अन्य नेताओं से होगी। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नजरें इस बैठक पर हैं, क्योंकि यह भारत-चीन संबंधों पर प्रभाव डाल सकती है। SCO का महत्व और वैश्विक तनाव के बीच यह समिट कई देशों के नेताओं को एकत्रित करेगी। जानें इस समिट के पीछे की रणनीतियाँ और अमेरिका की चिंताएँ।
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चीन में SCO समिट: मोदी की यात्रा और अमेरिका की चिंताएँ

प्रधानमंत्री मोदी का चीन दौरा

International News: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान के सफल दौरे के बाद अब चीन की यात्रा शुरू कर दी है। रविवार को वह तियानजिन में आयोजित SCO समिट में भाग लेंगे। इस अवसर पर मोदी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अन्य प्रमुख नेताओं से मुलाकात करेंगे। मोदी ने स्पष्ट किया है कि यह यात्रा भारत के राष्ट्रीय हितों और वैश्विक शांति को सुदृढ़ करेगी। यह दौरा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि मोदी 2018 के बाद पहली बार चीन जा रहे हैं। SCO समिट का प्रभाव अमेरिका तक महसूस किया जा रहा है, जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में भारतीय उत्पादों पर 50% टैरिफ लगाने का निर्णय लिया था। ऐसे में भारत अब चीन और यूरेशिया के देशों के साथ नई साझेदारियों की खोज कर सकता है।


ट्रंप की नजरें क्यों हैं SCO पर

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले भी वैश्विक व्यापार युद्ध को बढ़ावा दे चुके हैं। उनका उद्देश्य है कि भारत पर आर्थिक दबाव डालकर अमेरिका के हितों की रक्षा की जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि SCO समिट में मोदी और जिनपिंग की बैठक पर ट्रंप की नजर रहेगी, ताकि चीन और भारत के बीच की नजदीकी अमेरिका की रणनीति को कमजोर न कर सके।


SCO में शामिल प्रमुख देश

यह समिट 31 अगस्त से 1 सितंबर तक चलेगी, जिसमें 20 से अधिक देशों के नेता शामिल होंगे। रूस के राष्ट्रपति पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, बेलारूस के राष्ट्रपति लुकाशेंको, और ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान के राष्ट्रपतियों के अलावा तुर्की और नेपाल के नेता भी उपस्थित रहेंगे। इसके साथ ही, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस और ASEAN के महासचिव भी इस समिट में भाग लेंगे।


SCO का महत्व

SCO की स्थापना 1996 में शंघाई फाइव के रूप में हुई थी, जिसका उद्देश्य सीमा विवादों का समाधान और क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करना था। 2017 में भारत और पाकिस्तान इस संगठन में शामिल हुए, और बाद में ईरान और बेलारूस भी इसमें शामिल हुए। आज यह समूह दुनिया की 43% जनसंख्या और 23% अर्थव्यवस्था को जोड़ता है, जिससे यह अमेरिका और ट्रंप के लिए चिंता का विषय बन गया है।


तनाव के बीच SCO समिट

SCO समिट ऐसे समय में हो रही है जब रूस-यूक्रेन युद्ध और इजराइल-हमास संघर्ष जारी है। ट्रंप ने वैश्विक व्यापार युद्ध छेड़ रखा है, और दक्षिण एशिया तथा एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तनाव बढ़ता जा रहा है। इस माहौल में, चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग SCO के माध्यम से खुद को विश्व के नए नेता के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं, जबकि भारत संतुलन बनाए रखने की कोशिश करेगा।


अमेरिका की रणनीति

अमेरिका के लिए यह समिट एक परीक्षण का मामला है। ट्रंप पहले ही BRICS और वैश्विक दक्षिण संगठनों पर दबाव बना चुके हैं। अब वह क्वाड समिट के जरिए एशिया में चीन की पकड़ को कमजोर करना चाहते हैं। लेकिन यदि मोदी और जिनपिंग की बैठक से भारत-चीन संबंधों में सुधार होता है, तो यह सीधे ट्रंप की नीति को चुनौती देगा। इसलिए तियानजिन में होने वाली हर गतिविधि वाशिंगटन तक गूंजेगी।