ट्रंप ने पाकिस्तान के फील्ड मार्शल को मध्यस्थता का जिम्मा सौंपा
पश्चिम एशिया में मध्यस्थता की नई पहल
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष में मध्यस्थता के लिए अपने पसंदीदा फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को चुना है। ट्रंप ने मुनीर को यह जिम्मेदारी दी है कि वे अमेरिका द्वारा तैयार किए गए 15 सूत्री शांति प्रस्ताव को ईरान तक पहुंचाएं। हालांकि, पाकिस्तान की भूमिका इस प्रक्रिया में सीमित नजर आ रही है। तुर्की और मिस्र भी इस मध्यस्थता में शामिल हैं। पाकिस्तान अपने आप को अल्लाह के आदेश से स्थापित देश बताता है, जबकि तुर्की खलीफा के राज को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहा है। एर्दोआन के राष्ट्रपति बनने के बाद से तुर्की इस दिशा में सक्रिय है।
आसिम मुनीर की नई भूमिका
ट्रंप द्वारा पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को मध्यस्थता के लिए चुनना एक महत्वपूर्ण घटना है। यह दर्शाता है कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सत्ता केवल दिखावे की है। मुनीर ने वह हासिल किया है जो पहले किसी भी पाकिस्तानी तानाशाह को नहीं मिला था। वे बिना किसी संवैधानिक पद के पाकिस्तान के प्रभावशाली नेता बन गए हैं। ट्रंप और मुनीर में एक समानता यह है कि दोनों अपने-अपने देशों की सेनाओं का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका एक महाशक्ति है जबकि पाकिस्तान की स्थिति अलग है।
भारत की चिंताएं
भारत को इस स्थिति पर चिंता करने की आवश्यकता क्यों है? विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पाकिस्तान के मध्यस्थ चुने जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत 'पाकिस्तान की तरह दलाल देश' नहीं है। यह प्रतिक्रिया अनावश्यक थी और इससे यह संकेत मिलता है कि भारत अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को चुने जाने से नाराज है। भारत को यह समझना चाहिए कि अमेरिका के साथ उसके संबंधों के बावजूद, पाकिस्तान हमेशा उसकी प्राथमिकता में रहेगा।
कूटनीति की जटिलताएं
किसी देश की मध्यस्थता को 'दलाली' नहीं कहा जा सकता। विदेश मंत्री जयशंकर को यह बात अच्छी तरह से पता है। ओमान ने ईरान के साथ तनाव के दौरान मध्यस्थता की थी, और क्या उसे दलाल कहा जाएगा? इसी तरह, कतर ने इजराइल और हमास के बीच मध्यस्थता की थी। क्या उसे भी इसी तरह से देखा जाएगा? कूटनीति में शब्दों का खेल होता है, और इसे समझना आवश्यक है।
