डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड: CBI ने शुरू की जांच, जानें कैसे बचें
डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड पर केंद्र सरकार की कार्रवाई
नई दिल्ली: देश में बढ़ते 'डिजिटल अरेस्ट' धोखाधड़ी के मामलों को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी स्थिति रिपोर्ट पेश की है। सरकार ने बताया कि इस गंभीर साइबर अपराध की जांच अब केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी गई है, जिसने इस मामले में नई एफआईआर दर्ज कर दी है और जांच शुरू कर दी है।
दिल्ली में एनआरआई दंपति से ठगी का मामला
यह कदम तब उठाया गया जब दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में एक एनआरआई डॉक्टर दंपति से वीडियो कॉल के माध्यम से 14.85 करोड़ रुपये की ठगी का मामला सामने आया। इस घटना ने डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराधों की गंभीरता को उजागर किया है और सरकार को ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है।
CBI द्वारा जांच की शुरुआत
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि अदालत के निर्देशों के अनुसार दिल्ली पुलिस की एफआईआर को CBI को सौंपा गया है। इसके बाद CBI ने नई एफआईआर दर्ज कर मामले की गहन जांच शुरू कर दी है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि डिजिटल अरेस्ट जैसे संगठित साइबर अपराधों से निपटने के लिए एक प्रभावी रणनीति तैयार करने में कुछ समय लगेगा, इसलिए अदालत से एक महीने का अतिरिक्त समय मांगा गया है।
हाई-लेवल कमेटी का गठन
गृह मंत्रालय ने डिजिटल अरेस्ट की समस्या से निपटने के लिए एक उच्च स्तरीय अंतर-विभागीय समिति का गठन किया है। यह समिति विभिन्न विभागों के साथ मिलकर काम कर रही है और लोगों से प्राप्त सुझावों पर गंभीरता से विचार कर रही है, ताकि इस प्रकार की धोखाधड़ी को समाप्त किया जा सके।
भविष्य की योजना
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि सभी पहलुओं और सुझावों को ध्यान में रखते हुए एक मजबूत कार्ययोजना तैयार की जा रही है। इसका उद्देश्य भविष्य में लोगों को ऑनलाइन ठगी, धमकी और डराने की घटनाओं से सुरक्षित रखना है। इस मामले में आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई भी होनी है। पिछली सुनवाई में अदालत ने डिजिटल अरेस्ट मामलों की जांच CBI से कराने का आदेश दिया था।
डिजिटल अरेस्ट का खतरा
डिजिटल अरेस्ट एक नया साइबर फ्रॉड है, जिसमें ठग खुद को पुलिस, सरकारी एजेंसी या बैंक अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं। वे कानूनी शब्दों जैसे अरेस्ट वारंट, मनी लॉन्ड्रिंग या राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर वीडियो कॉल पर पीड़ित को मानसिक दबाव में रखते हैं और धीरे-धीरे उनसे बड़ी रकम ट्रांसफर करवा लेते हैं।
शिकार बनाने की प्रक्रिया
ठग पहले इम्परसनेशन कॉल करते हैं, फिर वीडियो कॉल पर निगरानी रखते हुए पीड़ित को अलग-थलग कर देते हैं। वे परिवार या बैंक से बात करने से रोकते हैं और किस्तों में अलग-अलग खातों के जरिए पैसे निकलवा लेते हैं। अंत में फर्जी 'रिफंड' का लालच देकर और भ्रम पैदा करते हैं।
सुरक्षा के उपाय
कानून में फोन या वीडियो कॉल पर किसी को 'अरेस्ट' करने का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसी किसी भी धमकी पर कॉल काटें और तुरंत 112 या 1930 (राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन) पर संपर्क करें। किसी भी राशि को ट्रांसफर करने से पहले अपने परिवार, वकील या बैंक से सलाह लें और कभी भी OTP, पिन या स्क्रीन शेयर किसी के साथ न करें।
