तमिलनाडु के थिरुपरनकुंड्रम में दीप जलाने का विवाद: अदालत ने दी अनुमति
तमिलनाडु में दीप जलाने का विवाद
तमिलनाडु: मदुरै के थिरुपरनकुंड्रम पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम के अवसर पर दीप जलाने को लेकर चल रहा विवाद अब न्यायालय में नया मोड़ ले चुका है। मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने एकल न्यायाधीश के निर्णय को बरकरार रखा है, जिसमें पहाड़ी की चोटी पर दीप जलाने की अनुमति दी गई थी।
अदालत का निर्णय
जस्टिस जी जयचंद्रन और जस्टिस केके रामकृष्णन की खंडपीठ ने हाल ही में अपना फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि एकल न्यायाधीश का आदेश पूर्व के मामलों से प्रभावित नहीं है, क्योंकि यह मुद्दा पहले कभी नहीं उठाया गया था।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दीप जलाने की संख्या निर्धारित की जा सकती है और इसके लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से परामर्श किया जाएगा। यह निर्णय राज्य सरकार, मंदिर प्रशासन और अन्य पक्षों की अपीलों को खारिज करते हुए आया है।
विवाद की जड़
थिरुपरनकुंड्रम पहाड़ी विभिन्न धर्मों के सह-अस्तित्व का प्रतीक रही है। यहां प्राचीन सुब्रमण्य स्वामी मंदिर है, जो मुरुगन के छह पवित्र निवासों में से एक है। इसके अलावा, पहाड़ी पर काशी विश्वनाथ मंदिर और सिकंदर बादशाह दरगाह भी स्थित हैं। मंदिर प्रशासन 1920 के एक पुराने अदालती फैसले के आधार पर पूरे पहाड़ी पर अधिकार का दावा करता है, जबकि दरगाह को अपनी संरचनाओं पर मान्यता प्राप्त है।
विवाद तब शुरू हुआ जब एक याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया कि कार्तिगई दीपम के दौरान पहाड़ी की चोटी पर दीपथून नामक पत्थर के स्तंभ पर दीप जलाने की अनुमति दी जाए। एकल न्यायाधीश ने यह निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता और कुछ अन्य लोगों को दीप जलाने की अनुमति दी जाए।
राज्य सरकार की आपत्ति
तमिलनाडु सरकार और मंदिर अधिकारियों ने इस आदेश का विरोध किया। उनका कहना था कि सदियों से दीपम मंडपम नामक पारंपरिक स्थान पर ही दीप जलाया जाता रहा है। पहाड़ी की चोटी पर दीप जलाने से कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है। दरगाह के निकट होने के कारण यह स्थान संवेदनशील है।
राज्य ने अपील में कहा कि यह एक नई प्रथा शुरू करने जैसा है, जो शांति को भंग कर सकती है। पिछले वर्ष भी यहां तनाव उत्पन्न हुआ था, जब हिंदू संगठनों ने विरोध किया और कुछ आरोप लगाए। भाजपा ने इसे 'दक्षिण का अयोध्या' कहा है।
दीपथून पर दीप जलाने की अनुमति
अदालत ने कानून-व्यवस्था की चिंताओं को खारिज करते हुए अपना फैसला बरकरार रखा। अब हर साल कार्तिगई दीपम पर दीपथून पर दीप जलाया जा सकेगा। यह निर्णय धार्मिक परंपराओं और सह-अस्तित्व के बीच संतुलन बनाने की कोशिश को दर्शाता है। हालांकि, कुछ पक्षों में असंतोष बना हुआ है और मामले की निगरानी जारी रहेगी। स्थानीय लोग शांति की उम्मीद कर रहे हैं।
